बिहार में त्रिशंकु फ़ैसला
क्या हुआ
इस चुनाव में किसी भी पार्टी या (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) को अकेले सरकार चलाने लायक़ सीटें नहीं मिलीं, और परिणाम (ऐसा परिणाम जिसमें किसी एक पार्टी को अकेले सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिलतीं) रहा।
राष्ट्रीय जनता दल ने सबसे ज़्यादा सीटें जीतीं — 324 में से 124 — लेकिन बहुमत से काफ़ी पीछे रही।
उसकी सबसे क़रीबी प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी ने 67 सीटें हासिल कीं।
क्या बदला
पिछले कार्यकाल में बिहार की सरकार चलाने वाली पार्टी का समर्थन ढह गया।
किसी भी और जोड़ी से ज़्यादा सीटें ज्वाला दल से राजद के पास गईं — इस तरह 94 सीटें हाथ बदलीं।
(पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) भी बढ़कर 61.7% हो गया, जो तब तक बिहार में दर्ज सबसे ऊँचा स्तर था।
अहम आँकड़े
इस चुनाव परिणाम के कुछ आँकड़े अपने आप में जानने लायक़ हैं।
सबसे क़रीबी मुक़ाबला: सीतामढ़ी, बिहार का फ़ैसला सिर्फ़ 35 वोटों से हुआ।
दूसरी ओर, इस चुनाव का सबसे बड़ा (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) सिवान, बिहार में रहा, जहाँ विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से 65.4% वोट आगे रहा। यह अंतर वोटों की गिनती में नहीं, कुल वोटों के हिस्से के रूप में मापा गया है।
सबसे ज़्यादा सीटें जीतने के बावजूद राजद के (कुल डाले गए वोटों का वह हिस्सा जो किसी एक पार्टी या उम्मीदवार को मिला) सिर्फ़ 28.3% रहा।
उस साल किसी भी सीट से ज़्यादा पंजीकृत मतदाता पटना पश्चिम, बिहार में थे, कुल 3,67,332।
पृष्ठभूमि
इस चुनाव के साथ बिहार विधान सभा के उन परिणामों का एक दौर पूरा हुआ, जो कभी बड़े बहुमत और कभी बेहद बँटे हुए सदन के बीच झूलते रहे।