त्रिशंकु और बिखरा हुआ परिणाम
क्या हुआ
बिहार का विधान सभा चुनाव (ऐसा परिणाम जिसमें किसी एक पार्टी को अकेले सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिलतीं) विधान सभा पर ख़त्म हुआ, जिसमें सत्ता कई दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों में बँट गई।
किसी भी एक पार्टी में सबसे ज़्यादा सीटें राष्ट्रीय जनता दल ने जीतीं — 243 में से 75 — जो अकेले बहुमत से काफ़ी कम थीं।
उसकी सबसे क़रीबी प्रतिद्वंद्वी जनता दल (यूनायटेड) 55 सीटों के साथ पीछे रही।
क्या बदला
पहले दो स्थानों के बाद परिणाम बेहद बिखरा हुआ था — बड़ी संख्या में सीटें निर्दलीय उम्मीदवारों और छोटे दलों के पास गईं।
17 सीटें निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीतीं, और 12 अलग-अलग दलों ने कम से कम एक-एक सीट जीती।
हाथ बदलने वाली सीटों में से 40 सीटें राजद से जदयू के पास गईं; पूरे राज्य में ऐसी कुल 169 सीटें थीं।
अहम आँकड़े
उस चुनाव के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
सबसे क़रीबी मुक़ाबला: लौरिया, बिहार का फ़ैसला सिर्फ़ 54 वोटों से हुआ, जो उस साल किसी भी सीट पर सबसे कम (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) था।
दूसरी ओर, गोबिन्दपुर, बिहार में जीत का अंतर 53.3% वोट रहा।
उस साल किसी भी सीट से ज़्यादा मतदाता पटना पश्चिम, बिहार में थे — 5,12,503 पंजीकृत मतदाता — और यहीं राज्य का सबसे कम (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) भी दर्ज हुआ, 34.2%।
इसके उलट, राज्य में सबसे ऊँचा मतदान प्रतिशत प्राणपुर, बिहार में दर्ज हुआ, 59.9%।
पृष्ठभूमि
यह पहले से छोटे नक्शे पर हुआ बिहार का पहला विधान सभा चुनाव था।
इस चुनाव से पहले विधान सभा में 324 सीटें थीं और अब 243 हैं, इसलिए सीटों की संख्या की सीधी तुलना नहीं की जा सकती।