गठबंधन की निर्णायक जीत
क्या हुआ
बिहार के सत्ताधारी (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) ने ज़ोरदार जीत दर्ज की और सहयोगी दलों को मिलाकर आसानी से बहुमत का आँकड़ा पार किया।
जनता दल (यूनायटेड) ने किसी भी दूसरी पार्टी से ज़्यादा सीटें जीतीं, 243 में से 115।
उसकी सबसे क़रीबी प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी 91 सीटों के साथ काफ़ी पीछे रही।
अपने गठबंधन के सहयोगी दलों के साथ जीतने वाले खेमे के पास कुल 206 सीटें थीं।
क्या बदला
वही अगुवा पार्टी पिछले चुनाव से भी ज़्यादा मज़बूत हुई और बिहार विधान सभा में सबसे ऊपर रहने का अपना सिलसिला आगे बढ़ाया।
जदयू अब लगातार 2 चुनावों में सबसे ज़्यादा सीटें जीत चुकी है।
उसे अपने पिछले परिणाम से 27 सीटें ज़्यादा भी मिलीं, जबकि कई प्रतिद्वंद्वी दलों की ज़मीन खिसकी।
अहम आँकड़े
उस चुनाव के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
पूरे राज्य में जदयू के (कुल डाले गए वोटों का वह हिस्सा जो किसी एक पार्टी या उम्मीदवार को मिला) सिर्फ़ 22.6% रहा।
सबसे क़रीबी मुक़ाबला: केवटी, बिहार का फ़ैसला सिर्फ़ 29 वोटों से हुआ, जो उस साल किसी भी सीट पर सबसे कम (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) था।
दूसरी ओर, कुम्हरार, बिहार में जीत का अंतर 58.6% वोट रहा।
सबसे ज़्यादा (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) कसबा, बिहार में रहा, 67.3%।
पृष्ठभूमि
इस चुनाव में वोट डालने आए मतदाताओं की संख्या भी कुछ बढ़ी।
पूरे राज्य का मतदान प्रतिशत पिछले चुनाव से 6.8 प्रतिशत अंक बढ़ा।