बिहार में महागठबंधन की वापसी
क्या हुआ
नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) ने विधान सभा में बहुमत हासिल किया, और राष्ट्रीय जनता दल उसकी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।1
राजद ने किसी भी दूसरी पार्टी से ज़्यादा सीटें जीतीं, 243 में से 80।
अपने सहयोगी दलों के साथ इस गठबंधन के पास 178 सीटें थीं, जो बहुमत से ज़्यादा थीं।
उसी गठबंधन की सहयोगी जनता दल (यूनायटेड) 71 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही।
चुनाव प्रचार
7 जून 2015 को लालू प्रसाद यादव ने एलान किया कि उनका राष्ट्रीय जनता दल विधान सभा चुनाव के लिए नीतीश कुमार के जनता दल (यूनायटेड) के साथ गठबंधन करेगा; यही इंडियन नेशनल कांग्रेस के साथ बने महागठबंधन की धुरी बना।2
11 जून 2015 को जीतन राम मांझी ने एलान किया कि उनका हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा इसके बजाय चुनाव के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल होगा।3
3 अगस्त 2015 को मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एलान किया कि वे ख़ुद चुनाव नहीं लड़ेंगे, पर महागठबंधन के प्रचार की अगुवाई करते रहेंगे। 11 अगस्त 2015 को उन्होंने गठबंधन में सीटों के बँटवारे का फ़ॉर्मूला घोषित किया: जनता दल (यूनायटेड) और राष्ट्रीय जनता दल 100-100 सीटों पर लड़ेंगे और कांग्रेस बाक़ी 40 पर।14
चुनाव आयोग ने 9 सितंबर 2015 को चुनाव कार्यक्रम घोषित किया: 12 अक्टूबर से 5 नवंबर के बीच पाँच चरणों में मतदान और 8 नवंबर को मतगणना। 14 सितंबर 2015 को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने अपना सीट बँटवारा घोषित किया, जिसमें भाजपा को 160 सीटें और राम विलास पासवान की लोक जन शक्ति पार्टी को 40 सीटें मिलीं, और बाक़ी सीटें उसके दो छोटे सहयोगी दलों में बँटीं।56
क्या बदला
राजद आगे बढ़कर बिहार महागठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी बन गई।
इस बार उसकी सीटें 22 से बढ़कर 80 हो गईं।
सबसे बड़ा बदलाव भारतीय जनता पार्टी से राजद की ओर रहा: जिन 135 सीटों पर पार्टी बदली, उनमें से 36 इसी तरह बदलीं।
(पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) पिछले चुनाव के मुक़ाबले 4.1 प्रतिशत अंक बढ़ा।
जदयू के अपने (कुल डाले गए वोटों का वह हिस्सा जो किसी एक पार्टी या उम्मीदवार को मिला) में -5.7 प्रतिशत अंक का बदलाव हुआ, जबकि गठबंधन के भीतर उसने अपनी ज़्यादातर सीटें बचाए रखीं।
अहम आँकड़े
सबसे क़रीबी मुक़ाबला तरारी, बिहार में हुआ, जहाँ (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) 272 वोट रहा।
सोनबरसा, बिहार में जीत 36.1% वोटों के अंतर से हुई, जो इस चुनाव का सबसे बड़ा जीत का अंतर था।
ठाकुरगंज, बिहार में किसी भी सीट से ज़्यादा मतदान प्रतिशत दर्ज हुआ, 70.0%।
पंजीकृत मतदाताओं के हिसाब से दीघा, बिहार सबसे बड़ा निर्वाचन क्षेत्र था, जिसकी मतदाता सूची में 4,33,632 नाम थे।
इस चुनाव का सबसे भीड़ भरा मुक़ाबला कुम्हरार, बिहार में हुआ, जहाँ मतपत्र पर 34 उम्मीदवार थे — और इसी सीट पर सबसे कम मतदान प्रतिशत भी दर्ज हुआ, 38.2%।
पूरे राज्य में (इनमें से कोई नहीं (नोटा) — मतपत्र का वह विकल्प, जिससे मतदाता सामने खड़े सभी उम्मीदवारों को औपचारिक रूप से नकार सकते हैं) को 9,47,279 वोट मिले, यानी कुल वोटों का 2.5%।
पृष्ठभूमि
संसद का बिहार पुनर्गठन अधिनियम 15 नवंबर 2000 से लागू हुआ, जिसने बिहार के 18 दक्षिणी ज़िलों से झारखंड को अलग राज्य बनाया। 2000 के आम चुनाव तक 324 सीटों वाली बिहार विधान सभा फ़रवरी 2005 के चुनाव से 243 सीटों की हो गई।7
उसी साल अक्टूबर और नवंबर में हुए नए चुनाव में जनता दल (यूनायटेड)-भारतीय जनता पार्टी गठबंधन ने 143 सीटें जीतीं, जिससे लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के तहत जनता दल और राष्ट्रीय जनता दल के नेतृत्व वाली पंद्रह साल की सरकार ख़त्म हुई। नीतीश कुमार ने उसी नवंबर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।8