फिर भारी जीत, पर पहले से कम सीटें
क्या हुआ
इंडियन नेशनल कांग्रेस फिर जीती और बाक़ी सबसे आराम से आगे रही।
कांग्रेस ने 318 में से 210 सीटें जीतीं — एक और भारी जीत के लिए काफ़ी।
उसकी सबसे क़रीबी प्रतिद्वंद्वी प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने 31 सीटें जीतीं।
फिर भी उसकी अपनी सीटें पिछले चुनाव की 239 से कम हो गईं।
क्या बदला
यह चुनाव देश भर में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ नए सिरे से तय होने के बाद हुआ, इस प्रक्रिया को (सीटों की सीमाओं को सरकारी तौर पर नए सिरे से खींचना, जो भारत की जनसंख्या में बदलाव के साथ समय-समय पर होता है) कहते हैं।
विधान सभा में सीटों की संख्या 330 से बदलकर 318 हो गई।
फिर भी, कांग्रेस अब राज्य में लगातार 2 चुनाव जीत चुकी थी।
अहम आँकड़े
उस मतगणना के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
सबसे क़रीबी मुक़ाबला: अस्थावां, बिहार का फ़ैसला सिर्फ़ 18 वोटों से हुआ, जो उस साल किसी भी सीट पर सबसे कम (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) था।
दूसरी ओर, इस चुनाव का सबसे बड़ा जीत का अंतर चनपटिया, बिहार में रहा, जहाँ विजेता और दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार के बीच 67.6% वोटों का फ़ासला था। यह अंतर वोटों की गिनती में नहीं, कुल वोटों के हिस्से के रूप में मापा गया है।
सबसे ज़्यादा (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) सुरसंड, बिहार में रहा, जहाँ 67.7% पंजीकृत मतदाताओं ने वोट डाला।
पंजीकृत मतदाताओं के हिसाब से निरसा, बिहार राज्य का सबसे बड़ा निर्वाचन क्षेत्र था, मतदाता सूची में 1,48,361 नाम थे।
पृष्ठभूमि
कांग्रेस ने राज्य पर अपनी पकड़ बनाए रखी और अब भी बिखरे हुए विपक्ष से बहुत आगे रहकर फिर सरकार चलाई।
इससे वही पार्टी सत्ता में बनी रही, सरकार नहीं बदली।