बिहार 1962 का नक्शा लोड हो रहा है…
पार्टी के हिसाब से सीटें
INC: 185 सीटें (58.2%)SWA: 50 सीटें (15.7%)PSP: 29 सीटें (9.1%)JHP: 20 सीटें (6.3%)CPI: 12 सीटें (3.8%)IND: 12 सीटें (3.8%)SOC: 7 सीटें (2.2%)BJS: 3 सीटें (0.9%)बहुमत के लिए 160318सरकार बनाने के लिए 160
  • INC18558.2%
  • SWA5015.7%
  • PSP299.1%
  • JHP206.3%
  • CPI123.8%
  • निर्दलीय123.8%
  • SOC72.2%
  • BJS30.9%
चुनाव की कहानी

बहुमत घटा, और एक नया मुख्य प्रतिद्वंद्वी

क्या हुआ

कांग्रेस बिहार में फिर जीती, हालाँकि बाक़ी दलों पर उसकी बढ़त घटती गई।

इंडियन नेशनल कांग्रेस ने 318 में से 185 सीटें जीतीं — अब भी बहुमत, पर पहले से छोटा।

पिछले चुनाव में उसने 210 सीटें जीती थीं।

उसकी सबसे क़रीबी प्रतिद्वंद्वी स्वतंत्र पार्टी ने 50 सीटें जीतीं।

क्या बदला

कांग्रेस का विरोधी खेमा और बिखरता गया, और कई नए दलों ने विधान सभा में अपनी पहली सीटें जीतीं।

इस साल स्वतंत्र पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी और अखिल भारतीय जनसंघ पहली बार विधान सभा में पहुँचे।

सरकार चलाने के लिए उसकी अपनी गुंजाइश भी घट गई: अब उसके पास बहुमत के लिए ज़रूरी सीटों से सिर्फ़ 25 सीटें ज़्यादा थीं।

अहम आँकड़े

उस मतगणना के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।

सबसे क़रीबी मुक़ाबला: लौकहा, बिहार का फ़ैसला सिर्फ़ 30 वोटों से हुआ, जो उस साल किसी भी सीट पर सबसे कम था।

दूसरी ओर, इस चुनाव का सबसे बड़ा जीत का अंतर बनमनखी, बिहार में रहा, जहाँ विजेता और दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार के बीच 73.4% वोटों का फ़ासला था। यह अंतर वोटों की गिनती में नहीं, कुल वोटों के हिस्से के रूप में मापा गया है।

सबसे ज़्यादा सोनबरसा, बिहार में रहा, जहाँ 69.7% पंजीकृत मतदाताओं ने वोट डाला।

पंजीकृत मतदाताओं के हिसाब से किशनपुर, बिहार राज्य का सबसे बड़ा निर्वाचन क्षेत्र था, मतदाता सूची में 1,05,196 नाम थे।

पृष्ठभूमि

कांग्रेस बिहार विधान सभा में सबसे ऊपर बनी रही, जबकि उसके आसपास का विपक्ष और बिखरता गया।

इसके साथ राज्य में वह लगातार 3 चुनाव जीत चुकी थी।

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