फिर बहुमत नहीं, सीटें हाथ बदलती रहीं
क्या हुआ
कांग्रेस ने फिर सबसे ज़्यादा सीटें जीतीं, पर अब भी बहुमत से पीछे रही।
इंडियन नेशनल कांग्रेस ने 318 सीटों में से 118 सीटें जीतीं।
इससे वह बहुमत के लिए ज़रूरी 160 सीटों से पीछे रह गई — एक और (ऐसा परिणाम जिसमें किसी एक पार्टी को अकेले सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिलतीं) विधान सभा।
उसकी सबसे क़रीबी प्रतिद्वंद्वी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने 52 सीटें जीतीं।
क्या बदला
फिर बहुत सारी सीटें एक पार्टी से दूसरी के हाथ गईं, हालाँकि कुल परिणाम पहले जैसा ही दिखा।
318 निर्वाचन क्षेत्रों में से 213 ने पिछले चुनाव से अलग पार्टी को चुना।
सबसे बड़ा बदलाव संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से कांग्रेस की ओर हुआ, जिसने इनमें से 30 सीटें अपने नाम कीं।
अहम आँकड़े
उस मतगणना के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
सबसे क़रीबी मुक़ाबला: महेशपुर, बिहार का फ़ैसला सिर्फ़ 37 वोटों से हुआ, जो उस साल किसी भी सीट पर सबसे कम (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) था।
दूसरी ओर, इस चुनाव का सबसे बड़ा जीत का अंतर मझगांव, बिहार में रहा, जहाँ विजेता और दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार के बीच 56.8% वोटों का फ़ासला था। यह अंतर वोटों की गिनती में नहीं, कुल वोटों के हिस्से के रूप में मापा गया है।
सबसे ज़्यादा (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) पारू, बिहार में रहा, जहाँ 76.7% पंजीकृत मतदाताओं ने वोट डाला।
पंजीकृत मतदाताओं के हिसाब से नवादा, बिहार राज्य का सबसे बड़ा निर्वाचन क्षेत्र था, मतदाता सूची में 1,20,659 नाम थे।
पृष्ठभूमि
कांग्रेस फिर बहुमत से पीछे रह गई, ठीक पिछले चुनाव की तरह।
इससे वही पार्टी सबसे आगे रही, और सरकार नहीं बदली।