वाम दलों की चौथी जीत
क्या हुआ
पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) फिर जीता, और उसके पहले से बड़े बहुमत में थोड़ा और इज़ाफ़ा हुआ।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) ने 294 में से 189 सीटें जीतीं — एक एकतरफ़ा परिणाम।
इससे वह 148 सीटों के बहुमत के आँकड़े से 41 सीटें आगे रही।
उसकी सबसे क़रीबी प्रतिद्वंद्वी इंडियन नेशनल कांग्रेस ने 43 सीटें जीतीं।
क्या बदला
सत्ताधारी गठबंधन फिर जीता, और इस बार अपेक्षाकृत कम सीटों पर पार्टी बदली।
माकपा अब लगातार 4 चुनाव जीत चुकी थी।
पिछले चुनाव के मुक़ाबले 294 में से 56 सीटों पर पार्टी बदली।
इनमें से अकेले 11 सीटें माकपा से कांग्रेस के पास गईं — उस साल का सबसे बड़ा बदलाव।
अहम आँकड़े
इस चुनाव के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
सबसे कड़ा मुक़ाबला टॉलीगंज, पश्चिम बंगाल में हुआ, जहाँ (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) सिर्फ़ 322 वोट रहा।
सबसे एकतरफ़ा मुक़ाबला कैनिंग पूर्व, पश्चिम बंगाल में रहा, जहाँ विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से 50.1% वोट से आगे रहा।
सबसे ज़्यादा (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) सबंग, पश्चिम बंगाल में रहा, 90.3%।
सबसे भीड़ भरा मुक़ाबला बड़ाबाज़ार, पश्चिम बंगाल में था, जहाँ 22 उम्मीदवार मैदान में थे।
पृष्ठभूमि
इस चुनाव तक यही गठबंधन पहली बार सत्ता में आने के बाद से राज्य का हर चुनाव जीत चुका था।