वाम मोर्चे की पहली जीत
क्या हुआ
पश्चिम बंगाल में एक नए (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) ने सत्ता सँभाली, और राज्य में पहले चल रही सरकार का अंत हुआ।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) ने अपने दम पर 294 में से 178 सीटें जीतीं — एक एकतरफ़ा परिणाम।
उसकी सबसे क़रीबी प्रतिद्वंद्वी जनता पार्टी थी, जिसने राज्य में पहली बार सीटें जीतीं और 29 सीटें हासिल कीं।
क्या बदला
यह नई विधान सभा सीमाओं पर हुआ पहला चुनाव भी था।
यह बदलाव (सीटों की सीमाओं को सरकारी तौर पर नए सिरे से खींचना, जो भारत की जनसंख्या में बदलाव के साथ समय-समय पर होता है) के बाद आया।
विधान सभा की सीटें 280 से बढ़कर 294 हो गईं।
जीतने वाली पार्टी पहले कभी सत्ता में नहीं रही थी; वह 14 सीटों से 178 सीटों पर पहुँची।
अहम आँकड़े
इस चुनाव के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
सबसे कड़ा मुक़ाबला बागदा, पश्चिम बंगाल में हुआ, जहाँ (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) सिर्फ़ 83 वोट रहा।
दूसरे छोर पर, सातगछिया, पश्चिम बंगाल में साल का सबसे एकतरफ़ा मुक़ाबला हुआ, जहाँ विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से 67.4% वोट से आगे रहा।
सबसे ज़्यादा (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) बंकुरा, पश्चिम बंगाल में रहा, 85.2%।
सबसे ज़्यादा मतदाता सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल में थे, कुल 1,52,071 पंजीकृत मतदाता।
पृष्ठभूमि
यह चुनाव जीतने वाला गठबंधन पहले कभी सरकार में नहीं रहा था।
इसे वाम मोर्चा के नाम से जाना गया।