बहुमत से पीछे, फिर भी सत्ता में
क्या हुआ
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) एक और कार्यकाल के लिए सत्ता में बनी रही, हालाँकि वह अपने दम पर बहुमत से ज़रा पीछे रह गई।
माकपा ने कुल 294 सीटों में से 143 सीटें जीतीं।
इसके बजाय उसने (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) गठबंधन के ज़रिए सरकार चलाई, जिसने 196 सीटों के साथ यह आँकड़ा पार किया।
इससे सत्ता में उसका दौर लगातार 6 चुनावों तक पहुँच गया।
क्या बदला
इसी चुनाव में एक नई विपक्षी पार्टी उभरी, और सरकार की मुख्य प्रतिद्वंद्वी कौन है, यह तस्वीर बदल गई।
आल इण्डिया तृणमूल कांग्रेस पहली बार विधान सभा में पहुँची और 60 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही।
उसके (कुल डाले गए वोटों का वह हिस्सा जो किसी एक पार्टी या उम्मीदवार को मिला) 30.7% था, जो माकपा के अपने 36.6% से ज़्यादा पीछे नहीं था।
अहम आँकड़े
उस चुनाव के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
सबसे कड़ा मुक़ाबला बारुईपुर, पश्चिम बंगाल में रहा, जहाँ (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) सिर्फ़ 5 वोट रहा।
दूसरे छोर पर, केशपुर, पश्चिम बंगाल 81.3% वोट के सुरक्षित अंतर से जीती गई।
(पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) में बड़ा फ़र्क़ रहा: सबंग, पश्चिम बंगाल में यह 90.5% रहा, जबकि बड़ाबाज़ार, पश्चिम बंगाल में सिर्फ़ 32.4%।
सबसे भीड़ भरा मुक़ाबला भाटपाड़ा, पश्चिम बंगाल में था, जहाँ एक सीट के लिए 16 उम्मीदवार मैदान में थे।
पृष्ठभूमि
यही पार्टी 1977 से लगातार पश्चिम बंगाल में सरकार चला रही थी।