कोई पार्टी अकेले सरकार नहीं बना सकी
क्या हुआ
इस चुनाव में (ऐसा परिणाम जिसमें किसी एक पार्टी को अकेले सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिलतीं) सदन बना।
पश्चिम बंगाल में सबसे ज़्यादा सीटें फिर भी इंडियन नेशनल कांग्रेस ने जीतीं, 280 में से 127, लेकिन यह बहुमत के 141 सीटों के आँकड़े से कम था।
दूसरे स्थान पर रही कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) ने 43 सीटें जीतीं — इस राज्य में पहली बार उसने कोई सीट जीती थी।
क्या बदला
यह बड़ी हुई विधान सभा के नक्शे पर हुआ पहला चुनाव भी था।
सीमाएँ फिर से (सीटों की सीमाओं को सरकारी तौर पर नए सिरे से खींचना, जो भारत की जनसंख्या में बदलाव के साथ समय-समय पर होता है) के ज़रिए तय की गई थीं।
विधान सभा की सीटें 252 से बढ़कर 280 हो गईं।
कांग्रेस यहाँ लगातार 4 चुनावों में सबसे ज़्यादा सीटें जीत चुकी थी, फिर भी पहली बार उसे अकेले सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं मिला।
अहम आँकड़े
उस मतगणना के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
सबसे कड़ा मुक़ाबला: बंकुरा, पश्चिम बंगाल का फ़ैसला सिर्फ़ 15 वोटों से हुआ, जो उस साल किसी भी सीट पर सबसे कम (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) था।
साल का सबसे बड़ा जीत का अंतर सुजापुर, पश्चिम बंगाल में रहा, 67.1% वोट।
सिंगुर, पश्चिम बंगाल में (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) 81.7% तक पहुँचा।
सबसे ज़्यादा मतदाता दमदम, पश्चिम बंगाल में थे, कुल 1,03,632 पंजीकृत मतदाता।
पृष्ठभूमि
यानी राज्य का विपक्ष पिछले चुनाव जैसा बिलकुल नहीं दिखता था।
यहाँ उभरा विपक्ष कुछ ही साल पहले राष्ट्रीय स्तर पर हुई टूट के बाद से ही अलग, पंजीकृत पार्टी के रूप में मौजूद था।