मतों का हिस्सा कम, फिर भी तीसरा कार्यकाल
क्या हुआ
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) के नेतृत्व वाला (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) पश्चिम बंगाल में फिर जीता, हालाँकि इंडियन नेशनल कांग्रेस को ज़्यादा वोट मिले।
उसने 294 में से 187 सीटें जीतीं — सीटों के हिसाब से एकतरफ़ा जीत, भले वोटों के हिसाब से नहीं।
इससे वह बहुमत के आँकड़े से 39 सीटें आगे रही।
कांग्रेस ने 40 सीटें जीतीं।
फिर भी उसे 41.8% वोट मिले और माकपा को 39.3% — सीटों का फ़ासला वोटों के फ़ासले से कहीं बड़ा था।
वाम मोर्चा के बाक़ी दलों के साथ मिलकर सदन की 73.5% सीटें उसके नियंत्रण में थीं।
चुनाव प्रचार
1984 के आम चुनाव के बाद राजीव गांधी द्वारा केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटाए गए प्रणब मुखर्जी 1986 में कांग्रेस (इंदिरा) से अलग हो गए और राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस बनाई। उनकी नई पार्टी ने कांग्रेस (आई) का साथ देने के बजाय अलग चुनाव लड़ा, और उसका प्रदर्शन ख़राब रहा।1
मतदान से पहले सत्ताधारी वाम मोर्चे ने 62 मौजूदा विधायकों को दोबारा टिकट नहीं दिया। मोर्चे की सबसे ताक़तवर पार्टी माकपा ने विधान सभा में नया जोश लाने की कोशिश में 35 छात्र नेताओं को नए उम्मीदवार बनाया।2
उस अप्रैल माकपा के मुख्यमंत्री ज्योति बसु वाम मोर्चे के स्टार प्रचारक थे, और उन्होंने हर उस सीट पर जाने का वादा किया जहाँ उनकी पार्टी का उम्मीदवार था। उनका कहना था कि दिल्ली की केंद्र सरकार संसाधनों के बँटवारे में पश्चिम बंगाल के साथ भेदभाव करती है।3
उस अप्रैल राज्य का दौरा करने दिल्ली से आए प्रधानमंत्री राजीव गांधी कांग्रेस (आई) के स्टार प्रचारक थे। पार्टी का मुख्य नारा ‘नतून बांग्ला’ — यानी नया बंगाल — था, और गांधी ने पश्चिम बंगाल में विकास और दस लाख नई नौकरियों का वादा किया।4
क्या बदला
माकपा ने पश्चिम बंगाल में सत्ता का अपना दौर और लंबा किया।
अब वह लगातार 3 चुनाव जीत चुकी थी।
सबसे बड़ा बदलाव कांग्रेस से माकपा की ओर रहा: जिन 51 सीटों पर पार्टी बदली, उनमें से 19 इसी तरह बदलीं।
ख़ुद माकपा की सीटें इस बार 174 से बढ़कर 187 हो गईं।
(पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) में पिछले चुनाव के मुक़ाबले -0.7 प्रतिशत अंक का बदलाव हुआ।
अहम आँकड़े
सबसे क़रीबी मुक़ाबला काशीपुर, पश्चिम बंगाल में हुआ, जहाँ (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) 425 वोट रहा।
इस चुनाव का सबसे बड़ा जीत का अंतर कालिम्पोंग, पश्चिम बंगाल में रहा, 84.3% वोट।
डेबरा, पश्चिम बंगाल में किसी भी सीट से ज़्यादा मतदान प्रतिशत दर्ज हुआ, 91.1%।
बेलगछिया पूर्व, पश्चिम बंगाल राज्य का सबसे बड़ा निर्वाचन क्षेत्र था, जहाँ 2,00,562 पंजीकृत मतदाता थे।
सबसे भीड़ भरा मुक़ाबला बड़ाबाज़ार, पश्चिम बंगाल में था, जहाँ 17 उम्मीदवार मैदान में थे।
पृष्ठभूमि
1964 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया टूट गई, और उससे अलग हुए धड़े ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्ससिस्ट) के नाम से अलग पंजीकरण कराया।5
इसी पार्टी ने आगे चलकर 1977 में 294 में से 231 सीटें जीतकर वाम मोर्चे को पश्चिम बंगाल की सत्ता तक पहुँचाया, और ज्योति बसु ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।6
वह सरकार लगातार सात विधान सभा चुनावों तक सत्ता में रही और 2011 में सत्ता से बाहर हुई।6