वाम मोर्चा फिर जीता, मैदान में नए प्रतिद्वंद्वी
क्या हुआ
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) ने (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) को एक और कार्यकाल के लिए पश्चिम बंगाल की सत्ता में वापस पहुँचाया।
उसने कुल 294 सीटों में से 174 सीटें जीतीं।
इससे वह बहुमत के आँकड़े से 26 सीटें आगे रही।
इंडियन नेशनल कांग्रेस 49 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही।
वोटों में मुक़ाबला सीटों से कहीं क़रीबी था: माकपा को 38.5% वोट मिले और कांग्रेस को 35.7%।
चुनाव प्रचार
राज्य सरकार ने आने वाले मानसून का हवाला देकर 15 मार्च 1982 को मतदान कराने की माँग की। लेकिन मतदान बाद में, 19 मई 1982 को, केरलम, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा के साथ हुआ।1
मतदान से पहले वाम मोर्चे ने तीन नए दलों को शामिल किया — कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, वेस्ट बंगाल सोशलिस्ट पार्टी और डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट पार्टी। वाम मोर्चे के कुछ पुराने, छोटे सहयोगी इस विस्तार से असहज थे; उनका कहना था कि इससे गठबंधन का राजनीतिक रंग फीका पड़ता है।2
कांग्रेस (आई) और कांग्रेस (एस) ने मिलकर चुनाव लड़ा। भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार पश्चिम बंगाल का विधान सभा चुनाव लड़ा; उसने 52 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, ताकि राज्य में भविष्य की एक तीसरी राजनीतिक ताक़त की ज़मीन तैयार हो सके।34
वाम मोर्चे का प्रचार उसके भूमि सुधार के रिकॉर्ड और ग्रामीण पंचायत व्यवस्था पर टिका था, जिसके चुनाव पहली बार 1978 में हुए थे। दार्जिलिंग की पहाड़ियों में 1980 के गोरखालैंड आंदोलन के बाद ‘राज्य नहीं, तो वोट नहीं’ के नारे के साथ बहिष्कार अभियान चला, और वहाँ (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) राज्य भर के 76.96% के मुक़ाबले घटकर 59.40% रह गया।56
क्या बदला
माकपा फिर जीती और सत्ता में उसका दौर और लंबा हुआ।
इसके साथ माकपा लगातार 2 चुनाव जीत चुकी थी।
फिर भी उसकी अपनी सीटें 178 से कुछ घटकर 174 रह गईं।
वोटों का सबसे बड़ा अकेला बदलाव असल में उलटी दिशा में हुआ: माकपा से कांग्रेस की ओर, जिसमें पार्टी बदलने वाली 77 सीटों में से 17 सीटें शामिल थीं।
मतदान प्रतिशत पिछले चुनाव के मुक़ाबले 20.0 प्रतिशत अंक बढ़कर तब तक राज्य के सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गया।
अहम आँकड़े
सबसे क़रीबी मुक़ाबला टीटागढ़, पश्चिम बंगाल में हुआ, जहाँ (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) 132 वोट रहा।
दांतन, पश्चिम बंगाल में जीत 49.1% वोटों के अंतर से हुई, जो उस साल पूरे राज्य में सबसे बड़ा जीत का अंतर था।
किसी भी सीट पर सबसे ज़्यादा मतदान प्रतिशत केशपुर, पश्चिम बंगाल में रहा, 89.2%।
सबसे कम मतदान प्रतिशत कालिम्पोंग, पश्चिम बंगाल में रहा, जहाँ 32.3% पंजीकृत मतदाताओं ने वोट डाला।
सबसे ज़्यादा मतदाता शिबपुर, पश्चिम बंगाल में थे, कुल 1,52,377 पंजीकृत मतदाता।
सबसे भरा हुआ बैलट बड़ाबाज़ार, पश्चिम बंगाल में था, जहाँ 12 उम्मीदवार मैदान में थे।
पृष्ठभूमि
7 नवंबर 1964 को कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया टूट गई, और उससे अलग हुए एक धड़े ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्ससिस्ट) के नाम से अलग पंजीकरण कराया।7
इसी पार्टी ने 1977 में वाम मोर्चे को पश्चिम बंगाल की सत्ता तक पहुँचाया, और ज्योति बसु ने राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। तब से माकपा वहाँ सरकार चला रही थी, और इस चुनाव में वह यही दौर आगे बढ़ाने के इरादे से उतरी।8