नए गठबंधन ने सत्ता सँभाली
क्या हुआ
इंडियन नेशनल कांग्रेस के हाथ से सत्ता निकलकर कई दलों के एक (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) के पास चली गई।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) ने पश्चिम बंगाल में सबसे ज़्यादा सीटें जीतीं, 280 में से 80, और एक बड़े गठबंधन के हिस्से के रूप में सरकार चलाई।
उस गठबंधन, दूसरा संयुक्त मोर्चा, के पास कुल 190 सीटें थीं, जो सरकार चलाने के लिए ज़रूरी 141 से काफ़ी ज़्यादा थीं।
ख़ुद कांग्रेस 55 सीटों पर सिमट गई; जिस पार्टी ने सरकार का नेतृत्व किया था, उसका यह भारी पतन था।
क्या बदला
सबसे बड़ा बदलाव एक ही दिशा में हुआ, एक के बाद एक सीट पर।
41 सीटें कांग्रेस से सीधे माकपा के पास चली गईं; उस साल किसी भी और दो दलों के बीच इतनी सीटें नहीं बदलीं।
पूरी विधान सभा में, तुलना की गई 280 सीटों में से 150 सीटों पर पार्टी पिछले चुनाव से बदल गई।
अहम आँकड़े
उस मतगणना के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
सबसे कड़ा मुक़ाबला: हबीबपुर, पश्चिम बंगाल का फ़ैसला सिर्फ़ 34 वोटों से हुआ, जो उस साल किसी भी सीट पर सबसे कम (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) था।
साल का सबसे बड़ा जीत का अंतर रघुनाथपुर, पश्चिम बंगाल में रहा, 55.2% वोट।
सागर, पश्चिम बंगाल में (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) 81.3% तक पहुँचा, जो राज्य के लिए नया शिखर था।
पृष्ठभूमि
इन बरसों में राज्य की सरकार दो चुनावों में दो बार बदली, और हर बार वह एक पार्टी के बजाय कई दलों से मिलकर बनी।
इस नई सरकार का नेतृत्व कर रही पार्टी ख़ुद कुछ ही समय पहले पूरी तरह अलग, स्वतंत्र रूप से पंजीकृत पार्टी बनी थी।