कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल बरक़रार रखा
क्या हुआ
इस राज्य का दूसरा विधान सभा चुनाव पहले जैसा ही रहा: इंडियन नेशनल कांग्रेस सत्ता में बनी रही, और पहले से ज़्यादा आराम से।
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने 252 में से 152 सीटें जीतीं, जो पिछली बार से 3 ज़्यादा थीं।
उसके (कुल डाले गए वोटों का वह हिस्सा जो किसी एक पार्टी या उम्मीदवार को मिला) बढ़कर 46.1% हो गया, जबकि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया 17.8% के साथ दूसरे स्थान पर रही।
क्या बदला
यह सीटों के नए नक्शे पर हुआ पहला चुनाव भी था।
कुछ ही समय पहले (सीटों की सीमाओं को सरकारी तौर पर नए सिरे से खींचना, जो भारत की जनसंख्या में बदलाव के साथ समय-समय पर होता है) के ज़रिए सीटों की सीमाएँ नए सिरे से तय की गई थीं।
उस साल के कुछ निर्वाचन क्षेत्र अब भी बहु-सदस्यीय थे, जहाँ एक ही मुक़ाबले से विधान सभा में एक से ज़्यादा विधायक पहुँचते थे।
उस साल 195 निर्वाचन क्षेत्रों में से 57 इसी तरह काम करते थे।
अहम आँकड़े
उस गिनती के कुछ और आँकड़े भी ध्यान खींचते हैं।
सबसे कड़ा मुक़ाबला: कांथी उत्तर, पश्चिम बंगाल का फ़ैसला सिर्फ़ 63 वोटों से हुआ, जो उस साल किसी भी सीट पर सबसे कम (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) था।
सबसे बड़ा जीत का अंतर कोतुलपुर, पश्चिम बंगाल में रहा, जहाँ सबसे आगे रहा उम्मीदवार बाक़ी सबसे 64.6% वोट आगे रहा।
सबसे ज़्यादा (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) सूती, पश्चिम बंगाल में रहा, 77.8%।
साल में सबसे ज़्यादा उम्मीदवार रायपुर, पश्चिम बंगाल में उतरे, एक ही बैलट पर 15 उम्मीदवार।
पृष्ठभूमि
इस परिणाम ने राज्य का शुरुआती ढर्रा बनाए रखा: एक पार्टी आराम से सरकार चला रही थी, और विपक्ष कई छोटे दलों में बँटा हुआ था।