वापसी का चुनाव
क्या हुआ
इंदिरा गांधी भारी जीत के साथ सत्ता में लौटीं। उन्होंने कांग्रेस (आई) का नेतृत्व किया, वह नई पार्टी जो उन्होंने 1977 में कांग्रेस की हार के बाद खड़ी की थी।1
उसने 529 सीटों में से 353 सीटें जीतीं।
यह बहुमत के लिए ज़रूरी सीटों से 88 ज़्यादा था।
इंडियन नेशनल कांग्रेस (इंदिरा) को (कुल डाले गए वोटों का वह हिस्सा जो किसी एक पार्टी या उम्मीदवार को मिला) 42.7% मिला।
उसकी सबसे क़रीबी प्रतिद्वंद्वी जनता पार्टी (सेक्युलर) ने 41 सीटें जीतीं।
चुनाव प्रचार
1977 में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई, और इंदिरा गांधी ने अविभाजित पार्टी से अलग होकर अपना गुट, कांग्रेस (आई), बनाया।1
मोरारजी देसाई की जनता सरकार ने बहुमत खो दिया और देसाई ने जुलाई 1979 में इस्तीफ़ा दे दिया। फिर राज नारायण ने अलग होकर जनता पार्टी (सेक्युलर) बनाई, और चरण सिंह ने 16 जुलाई को उसका नेतृत्व संभाला। 28 जुलाई को वे कांग्रेस (आई) के समर्थन से प्रधानमंत्री बने।23
टूट से कमज़ोर हुई मूल जनता पार्टी ने जगजीवन राम को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर चुनाव लड़ा।4
फिर चुनाव दो मतदान दिनों, 3 और 6 जनवरी को हुआ। इंदिरा गांधी ने खुद उस चुनाव में दो सीटों से चुनाव लड़ा, उत्तर प्रदेश की रायबरेली और आंध्र प्रदेश की मेडक। दोनों पर वे जीतीं और उन्होंने मेडक को अपने पास रखा।56
क्या बदला
यह परिणाम जितना जीत की कहानी था, उतना ही पिछली बार जीतने वाली पार्टी के बिखरने की कहानी भी था।
सबसे ज़्यादा ज़मीन जनता पार्टी ने गँवाई; उसकी पिछली सीटों में से 195 सीटें इंडियन नेशनल कांग्रेस (इंदिरा) के हाथ आईं।
देश भर में तुलना के लायक 529 सीटों में से 467 सीटें एक पार्टी से दूसरी पार्टी के पास चली गईं।
इसका बड़ा हिस्सा कांग्रेस की उसी टूट को दिखाता है, जिसे अब उसकी उत्तराधिकारी पार्टियों के नाम पर गिना गया है; यह पूरी तरह नई राजनीतिक ज़मीन नहीं है।
दो नए दल, जनता पार्टी (सेक्युलर) और इंडियन नेशनल कांग्रेस (उर्स), पहली बार असली ताक़त के साथ संसद में पहुँचे।
अहम आँकड़े
सबसे कड़ा मुक़ाबला: देवरिया, उत्तर प्रदेश का फ़ैसला 77 वोटों से हुआ — उस साल किसी भी सीट पर सबसे कम (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा)।
दूसरी ओर, कुरनूल, आंध्र प्रदेश में विजेता ने दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार को 68.5% से हराया। वोटों के हिस्से के रूप में मापें तो यह उस साल किसी भी सीट पर सबसे बड़ा जीत का अंतर था।
देश में सबसे ज़्यादा (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) लक्ष्द्वीप, लक्षद्वीप में रहा: 88.3%।
सबसे ज़्यादा पंजीकृत मतदाता बंबई उत्तर पूर्व, महाराष्ट्र में थे: 9,16,054।
सबसे भरा हुआ मतपत्र चंडीगढ़, चंडीगढ़ का था, जहाँ 39 उम्मीदवार मैदान में थे।
देश भर में मतदान प्रतिशत 56.1% रहा, जो पिछले चुनाव से -3.5 प्रतिशत अंक का बदलाव था।
पृष्ठभूमि
1977 से सत्ता में रही मोरारजी देसाई की जनता सरकार ने जुलाई 1979 में बहुमत खो दिया। चरण सिंह कांग्रेस (आई) के बाहर से समर्थन से प्रधानमंत्री बने, लेकिन फिर वह समर्थन भी वापस ले लिया गया।2
यह बिखराव कांग्रेस की अपनी 1978 की टूट के बाद आया, जब इंडियन नेशनल कांग्रेस (इंदिरा) इंदिरा गांधी के अपने गुट के रूप में अलग हुई।1
चरण सिंह का अलग हुआ दल, जिसका नाम चुनाव से पहले बदलकर लोक दल रखा गया, दूसरे स्थान पर रहा: जनता पार्टी (सेक्युलर) ने 41 सीटें जीतीं।3