कांग्रेस सत्ता में लौटी, लेकिन बहुमत के बिना
क्या हुआ
पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के नेतृत्व में इंडियन नेशनल कांग्रेस पाँच साल विपक्ष में रहने के बाद सत्ता में लौटी।1
उसने 543 में से 145 सीटें जीतीं, किसी भी दूसरी पार्टी से ज़्यादा।
इससे वह 272 सीटों के बहुमत के आँकड़े से पीछे रह गई, यानी (ऐसा परिणाम जिसमें किसी एक पार्टी को अकेले सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिलतीं) सदन।
भारतीय जनता पार्टी 22.2% वोटों के साथ 138 सीटें जीतकर ठीक पीछे रही।
इसके बजाय उसने (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) के ज़रिए सरकार चलाई, जिसके पास कुल 219 सीटें थीं।
चुनाव प्रचार
जनवरी 2004 में भाजपा के नेतृत्व वाले सत्ताधारी गठबंधन ने 'इंडिया शाइनिंग' का नारा आगे बढ़ाया। इसे विज्ञापन कंपनी ग्रे वर्ल्डवाइड ने वित्त मंत्री जसवंत सिंह से सलाह करके तैयार किया था। द कैरवान के मुताबिक़ सरकार ने चुनाव से पहले के महीनों में इसके प्रचार पर 100 करोड़ रुपये से ज़्यादा ख़र्च किए।2
6 फ़रवरी 2004 को राष्ट्रपति ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल की सलाह पर 13वीं लोक सभा भंग कर दी, और चुनाव तय समय से लगभग सात महीने पहले बुलाए गए। फिर चुनाव आयोग ने चार चरणों का कार्यक्रम तय किया: 20 अप्रैल, 26 अप्रैल, 5 मई और 10 मई को मतदान, और 13 मई को मतगणना।34
5 अप्रैल 2004 को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बेटे राहुल गांधी ने अमेठी से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाख़िल किया, और इसी के साथ चुनावी राजनीति में क़दम रखा। 6 अप्रैल को भाजपा और अन्नाद्रमुक ने चुनाव आयोग से कहा कि वे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेशी मूल को चुनावी मुद्दे के रूप में उठाते रहेंगे।51
8 अप्रैल को वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए नेताओं ने दिल्ली में बैठक करके गठबंधन का घोषणापत्र, 'विकास और सुशासन का एजेंडा', स्वीकार किया।6
क्या बदला
परिणाम बदलने से पहले देश भर में मतदान का तरीक़ा ही बदल गया: यह पहला चुनाव था जिसमें हर निर्वाचन क्षेत्र में काग़ज़ी मतपत्रों की जगह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल हुआ।7
इंडियन नेशनल कांग्रेस पिछली बार की 114 सीटों से बढ़कर इस बार 145 सीटों पर पहुँची।
देश भर में तुलना के लायक 543 सीटों में से 282 दूसरी पार्टी के हाथ गईं।
सबसे बड़ा झुकाव भाजपा से कांग्रेस की ओर रहा, 54 सीटें इस तरफ़ गईं।
(पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) पिछले चुनाव से 1.3 प्रतिशत अंक घटकर लगभग 58.0% रह गया।
अहम आँकड़े
इस चुनाव का सबसे कड़ा मुक़ाबला लक्ष्द्वीप, लक्षद्वीप में हुआ: विजेता की (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) 71 वोट था।
आरामबाग, पश्चिम बंगाल में तस्वीर उलटी रही: वहाँ विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कुल वोटों के 61.4% आगे रहा — उस साल किसी भी सीट पर सबसे बड़ा जीत का अंतर।
सबसे ज़्यादा मतदान प्रतिशत नागालैंड, नागालैंड में रहा, जहाँ 91.7% पंजीकृत मतदाताओं ने वोट डाला — उस साल किसी भी सीट में सबसे ज़्यादा।
पंजीकृत मतदाताओं के हिसाब से बाहरी दिल्ली, दिल्ली देश का सबसे बड़ा निर्वाचन क्षेत्र था, जिसकी मतदाता सूची में 33,68,399 नाम थे।
इस चुनाव का सबसे भरा हुआ बैलट मद्रास दक्षिण, तमिलनाडु में था, जहाँ 35 उम्मीदवार मैदान में थे।
तेलंगाना राष्ट्र समिति ने इस चुनाव में पहली बार लोक सभा सीटें जीतीं।
पृष्ठभूमि
2001 में पारित 84वें संविधान संशोधन ने लोक सभा और राज्य विधान सभाओं में हर राज्य की सीटों की संख्या को 2026 के बाद की पहली जनगणना तक 1971 की जनगणना के स्तर पर रोक दिया।8
जनवरी 2004 से लागू 91वें संविधान संशोधन ने वह रास्ता बंद कर दिया जिससे विधायक और सांसद अलग गुट बनाकर दलबदल-विरोधी दंड से बच जाते थे, और मंत्रिमंडल का आकार विधायिका की सदस्य संख्या के 15% तक सीमित कर दिया।9
सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में उम्मीदवारों के लिए जानकारी देने वाले चुनावी हलफ़नामे भी अनिवार्य कर दिए थे, जिनमें हर उम्मीदवार को आपराधिक मामले, संपत्ति, देनदारियाँ और शैक्षणिक योग्यता बतानी होती है।10