कांग्रेस में फूट के बाद इंदिरा गांधी की जीत
क्या हुआ
पार्टी के बँटवारे के बाद इंदिरा गांधी के नेतृत्व में इंडियन नेशनल कांग्रेस ने एकतरफ़ा जीत हासिल की।1
उसने 518 सीटों में से 352 सीटें जीतीं, यानी अपने दम पर बहुमत।
यह बहुमत के लिए ज़रूरी 260 सीटों के आँकड़े से 92 सीटें ज़्यादा था।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) 5.1% वोट और 25 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही।
पार्टी के (कुल डाले गए वोटों का वह हिस्सा जो किसी एक पार्टी या उम्मीदवार को मिला) 43.7% तक पहुँचा, जो भारत की 'सबसे ज़्यादा वोट पाने वाला जीतेगा' (फ़र्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट) व्यवस्था में फिर भी 68.0% सीटों में बदल गया।
चुनाव प्रचार
12 नवंबर 1969 को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को निष्कासित कर दिया, जिसके बाद इंडियन नेशनल कांग्रेस टूट गई। उनके धड़े ने कांग्रेस (आर) नाम लिया, पुराना संगठन कांग्रेस (ओ) के रूप में चलता रहा, और कांग्रेस (आर) ने 1971 का चुनाव उनकी अपनी पार्टी के रूप में लड़ा।1
फूट के बाद पक्का बहुमत न होने पर इंदिरा गांधी ने 27 दिसंबर 1970 को, लगभग एक साल पहले ही, लोक सभा भंग करवा दी। इसके बाद फ़रवरी-मार्च 1971 में हुए चुनाव ने लोक सभा और विधान सभा चुनाव साथ कराने की परंपरा हमेशा के लिए तोड़ दी।2
पाँच विपक्षी दल, कांग्रेस (ओ), संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, स्वतंत्र पार्टी और भारतीय जनसंघ, चुनाव से पहले एक साथ आए। उन्होंने कांग्रेस (आर) के ख़िलाफ़ मिलकर सीटें लड़ने के लिए महागठबंधन (ग्रैंड अलायंस) नाम का समझौता किया।3
क्या बदला
कांग्रेस को सबसे बड़ा फ़ायदा स्वतंत्र पार्टी की क़ीमत पर हुआ।
इस तरह जिन सीटों पर पार्टी बदली, उनमें से 27 उसके खाते में गईं।
पिछले चुनाव के मुक़ाबले देश भर में 518 निर्वाचन क्षेत्रों में से 222 में जीतने वाली पार्टी बदल गई।
पिछले चुनाव के मुक़ाबले कांग्रेस की अपनी सीटें 69 बढ़ीं।
देश भर में (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) 5.8 प्रतिशत अंक गिरकर लगभग 54.2% रह गया।
अहम आँकड़े
सबसे क़रीबी मुक़ाबला तिरुचेंदूर, तमिलनाडु में हुआ, जिसका फ़ैसला 26 वोटों से हुआ।
सबसे बड़ा (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) ककिनाडा, आंध्र प्रदेश में रहा, जहाँ विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से 81.8% वोट आगे रहा।
सबसे ज़्यादा मतदान प्रतिशत थन्जावुर, तमिलनाडु में रहा, जहाँ 78.7% पंजीकृत मतदाताओं ने वोट डाला, जो देश की किसी भी सीट पर सबसे ज़्यादा था।
पूरे देश में सबसे ज़्यादा मतदाता बंबई उत्तर पूर्व, महाराष्ट्र में थे, मतदाता सूची में 8,58,986 पंजीकृत मतदाता थे।
किसी भी सीट से ज़्यादा उम्मीदवार सिकंदराबाद, आंध्र प्रदेश में उतरे, बैलट पर 16 नाम थे।
पृष्ठभूमि
12 नवंबर 1969 को कांग्रेस टूट गई, जब वरिष्ठ नेताओं ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पार्टी से निष्कासित कर दिया।1
इंदिरा गांधी ने 27 दिसंबर 1970 को, कार्यकाल पूरा होने से लगभग एक साल पहले, लोक सभा भंग करवा दी। इसके बाद हुए चुनाव ने भारत में लोक सभा और विधान सभा चुनाव एक ही चक्र में कराने की परंपरा हमेशा के लिए तोड़ दी।2
महागठबंधन में पाँच विपक्षी दल एक साथ आए, ताकि इंदिरा गांधी की कांग्रेस के ख़िलाफ़ मिलकर सीटें लड़ सकें।3