नए नक्शे पर एकतरफ़ा जीत
क्या हुआ
इंडियन नेशनल कांग्रेस एक बार फिर सत्ता में बनी रही और पिछले चुनाव से चल रही सरकार उसके पास ही रही।
उस साल चुनाव वाली 494 सीटों में से उसने 361 सीटें जीतीं।
इससे वह बहुमत के आँकड़े से 113 सीटें आगे रही।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया 9.9% वोट पाकर 29 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही।
यह एकतरफ़ा जीत थी: कांग्रेस ने 44.7% वोट पाकर सदन की कुल सीटों में से 73.1% सीटें जीतीं।
चुनाव प्रचार
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के महासचिव अजय घोष का 13 जनवरी 1962 को निधन हो गया, मतदान से लगभग पाँच हफ़्ते पहले। एस.ए. डांगे पार्टी के पहले अध्यक्ष बने और ई.एम.एस. नंबूदिरिपाद महासचिव बने, और भाकपा नए नेतृत्व के साथ प्रचार में उतरी।1
जवाहरलाल नेहरू ने प्रधानमंत्री के रूप में कांग्रेस का नेतृत्व करते हुए चुनाव लड़ा; 1964 में उनके निधन से पहले यह उनका तीसरा और आख़िरी लोक सभा चुनाव अभियान था।2
सोशलिस्ट पार्टी के नेता राम मनोहर लोहिया ने फूलपुर सीट से सीधे नेहरू के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ा और उनके सबसे प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बने। लोहिया हार गए।3
सी. राजगोपालाचारी ने 1959 में स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की थी। इस साल पार्टी ने अपना पहला लोक सभा चुनाव लड़ा और कांग्रेस के आर्थिक नियंत्रणों के ख़िलाफ़ प्रचार किया, जिन्हें राजगोपालाचारी "लाइसेंस-परमिट राज" कहते थे।4
भारतीय जनसंघ के मौजूदा सांसद अटल बिहारी वाजपेयी बलरामपुर की अपनी सीट कांग्रेस उम्मीदवार सुभद्रा जोशी से हार गए। सुभद्रा जोशी पहले यह सीट जीत चुकी थीं और 1957 में इसे वाजपेयी से हार गई थीं।5
क्या बदला
यह निर्वाचन क्षेत्रों की नई सीमाओं पर हुआ पहला चुनाव था, जिन्हें पिछले मतदान के बाद एक बार फिर नए सिरे से तय किया गया था।
चुनाव आयोग ने 19-25 फ़रवरी 1962 को मतदान कराया, और पहली बार हर निर्वाचन क्षेत्र से सिर्फ़ एक सदस्य चुना गया। इससे पहले दो चुनावों में चली आ रही दो-सदस्यीय व्यवस्था ख़त्म हो गई।6
सीमाएँ नए सिरे से तय करने की इस प्रक्रिया को (सीटों की सीमाओं को सरकारी तौर पर नए सिरे से खींचना, जो भारत की जनसंख्या में बदलाव के साथ समय-समय पर होता है) कहते हैं।
इस साल के सभी 494 निर्वाचन क्षेत्रों में से हर एक ने ठीक एक सांसद चुना, यानी 494 सीटों वाले सदन में हर सीट के लिए एक निर्वाचन क्षेत्र।
अहम आँकड़े
लगभग 54.7% पंजीकृत मतदाताओं ने वोट डाला, जो उस समय तक किसी भी आम चुनाव में सबसे ज़्यादा था।
इस चुनाव का सबसे कड़ा मुक़ाबला बाह्य मणिपुर, मणिपुर में हुआ, जिसका फ़ैसला 42 वोटों से हुआ, जो उस साल किसी भी सीट पर सबसे कम (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) था।
दूसरी ओर, भंजनगर, ओडिशा में विजेता ने दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार को 72.1% वोटों के अंतर से हराया। उस साल किसी एक सीट पर यह सबसे बड़ा जीत का अंतर था, जिसे वोटों की गिनती में नहीं, कुल वोटों के हिस्से के रूप में मापा गया है।
कहीं भी सबसे ज़्यादा (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) नागपट्टिनम, मद्रास में रहा, 80.7%।
किसी एक सीट पर सबसे ज़्यादा मतदाता बंबई शहर उत्तर, महाराष्ट्र में थे, कुल 7,64,016 पंजीकृत मतदाता, जो उस साल किसी भी दूसरे निर्वाचन क्षेत्र से ज़्यादा थे।
इस चुनाव का सबसे भरा हुआ बैलट जयपुर, राजस्थान में था, जहाँ 11 उम्मीदवार मैदान में थे।
पृष्ठभूमि
कांग्रेस से नाता तोड़ने के बाद सी. राजगोपालाचारी ने 4 जून 1959 को खुले बाज़ार की समर्थक और समाजवाद-विरोधी स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की। पार्टी ने 1962 में अपना पहला आम चुनाव लड़ा और लोक सभा की 18 सीटें जीतीं।7
उस साल कुछ और नई राजनीतिक ताक़तों ने भी पहली बार संसद में अपनी पहचान बनाई।
इस चुनाव में स्वतंत्र पार्टी, द्रमुक और सोशलिस्ट पार्टी पहली बार अच्छी-ख़ासी सीटों तक पहुँचे।