कांग्रेस की वापसी, पर मैदान में भीड़ बरक़रार
क्या हुआ
कांग्रेस सत्ता में लौटी, हालाँकि कोई भी पार्टी बहुमत के आसपास नहीं पहुँची।
इंडियन नेशनल कांग्रेस ने 140 सीटों में से 51 सीटें जीतीं, जो 71 सीटों के बहुमत के आँकड़े से कम थीं, यानी (ऐसा परिणाम जिसमें किसी एक पार्टी को अकेले सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिलतीं) सदन।
उसकी सबसे क़रीबी प्रतिद्वंद्वी स्वतंत्र पार्टी ने 36 सीटें जीतीं।
क्या बदला
पिछले चुनाव के मुक़ाबले परिणामों में भारी बदलाव आया, और कई निर्वाचन क्षेत्रों में सीट दूसरी पार्टी के पास चली गई।
140 निर्वाचन क्षेत्रों में से 88 ने 1967 से अलग पार्टी को चुना।
सबसे बड़ा बदलाव स्वतंत्र पार्टी से कांग्रेस की ओर रहा, जिसे इनमें से 13 सीटें मिलीं।
अहम आँकड़े
उस चुनाव के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
सबसे कड़ा मुक़ाबला खूंटा, ओडिशा में हुआ, जहाँ फ़ैसला सिर्फ़ 15 वोटों से हुआ; उस साल किसी भी सीट पर यह सबसे कम (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) था।
दूसरी ओर, इस चुनाव का सबसे बड़ा जीत का अंतर बरहामपुर, ओडिशा में रहा, जहाँ विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से 63.2% आगे रहा।
राउरकेला, ओडिशा दो बातों में अलग दिखी: यह राज्य का सबसे बड़ा निर्वाचन क्षेत्र था, जहाँ मतदाता सूची में 1,05,764 नाम थे, और सबसे ज़्यादा उम्मीदवारों वाला भी, जहाँ 13 उम्मीदवार मैदान में थे।
पृष्ठभूमि
इस दौर में ओडिशा का विपक्ष कई क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों में बँटा रहा।
नई पार्टियाँ भी पहली बार मैदान में आईं: उत्कल कांग्रेस और झारखण्ड पार्टी।