बीजू जनता दल को दूसरा कार्यकाल
क्या हुआ
बीजू जनता दल ने लगातार दूसरे चुनाव में ओडिशा में सत्ता बनाए रखी, हालाँकि पहली जीत से कम सीटों के साथ।
उसने कुल 147 सीटों में से 61 सीटें जीतीं।
यह अपने दम पर 74 सीटों के बहुमत के आँकड़े से कम था।
उसने (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) के ज़रिए सरकार चलाना जारी रखा; गठबंधन में दल मिलकर चुनाव लड़ते हैं और मिलाकर पर्याप्त सीटें जीतने पर सत्ता बाँटते हैं।
असल में इंडियन नेशनल कांग्रेस को ज़्यादा वोट मिले, बीजद के 27.4% के मुक़ाबले 34.8%, पर इससे उसे काफ़ी कम सीटें मिलीं।
चुनाव प्रचार
चुनाव आयोग ने 29 फ़रवरी 2004 को कार्यक्रम घोषित किया। लोक सभा चुनाव के साथ दो चरणों में, 20 और 26 अप्रैल को, मतदान हुआ, और 13 मई को वोटों की गिनती हुई।1
बीजू जनता दल और भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगी दलों के रूप में लड़े और सीटें 4:3 के अनुपात में बाँटीं; बीजद के प्रचार की अगुवाई नवीन पटनायक ने और भाजपा के प्रचार की अगुवाई जुएल ओराम ने की।2
पूर्व मुख्यमंत्री जानकी बल्लभ पटनायक के नेतृत्व में इंडियन नेशनल कांग्रेस ने शिबू सोरेन के झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के साथ विपक्षी गठबंधन की अगुवाई की; कांग्रेस 147 में से 133 सीटों पर लड़ी और झामुमो 12 सीटों पर।3
बिजय महापात्र के नेतृत्व में नई बनी ओडिशा गण परिषद भी उस गठबंधन में शामिल हुई; उसने चार उम्मीदवार उतारे और दो सीटें जीतीं, जो विधान सभा में उसकी पहली सीटें थीं।4
पहले चरण में, 20 अप्रैल को, मौजूदा मंत्री द्रौपदी मुर्मू फिर से भाजपा की ओर से रायरंगपुर से लड़ीं और झामुमो के रामचंद्र मुर्मू को 42 वोटों से हराया; उस साल राज्य का यह सबसे कड़ा मुक़ाबला था।5
क्या बदला
सबसे बड़ा बदलाव बीजद के ख़िलाफ़ गया, हालाँकि कुल मिलाकर उसने सत्ता बनाए रखी।
तुलना की गई 147 सीटों में से 16 सीटें बीजद से कांग्रेस के पास गईं।
कुल मिलाकर दूसरी पार्टी के पास गई 64 सीटों में यह सबसे बड़ा बदलाव था।
बीजद की अपनी सीटें 68 से 61 हो गईं; यह उसकी लगातार दूसरी जीत थी, पर पहले से छोटी।
(पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) पिछले चुनाव से 7.6 प्रतिशत अंक बढ़ा।
अहम आँकड़े
रायरंगपुर, ओडिशा का फ़ैसला 42 वोटों से हुआ, जो कहीं भी सबसे कड़ा मुक़ाबला था; मौजूदा मंत्री द्रौपदी मुर्मू ने वहाँ झामुमो के रामचंद्र मुर्मू के ख़िलाफ़ अपनी सीट बचाई।5
सबसे बड़ा (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) हिंजिली, ओडिशा में रहा, 49.3% वोट।
सबसे ज़्यादा मतदान प्रतिशत आठमल्लिक, ओडिशा में दर्ज हुआ, 77.3%।
पंजीकृत मतदाताओं के हिसाब से भुवनेश्वर, ओडिशा सबसे बड़ा निर्वाचन क्षेत्र था, जहाँ सूची में 4,43,908 मतदाता थे; साल का सबसे कम मतदान प्रतिशत भी यहीं दर्ज हुआ, 40.2%।
सबसे ज़्यादा उम्मीदवार बांगिरिपोसी, ओडिशा में उतरे, बैलट पर 15 नाम थे।
बिजय महापात्र के इसे बनाने के कुछ ही महीनों बाद उड़ीसा गण परिषद उस साल सीटें जीतने वाली ओडिशा की इकलौती नई पार्टी बनी।4
पृष्ठभूमि
नवीन पटनायक ने जनता दल से अलग होकर 26 दिसंबर 1997 को बीजू जनता दल बनाया और इसका नाम अपने दिवंगत पिता, पूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक के नाम पर रखा।6
उन्होंने 5 मार्च 2000 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, और इस जीत से वह सिलसिला आगे बढ़ा जो 2024 तक चला।7
बीजद ने आगे चलकर 2000 से 2019 तक ओडिशा का हर चुनाव जीता; 2004 के इस परिणाम ने उस सिलसिले को जारी रखा।6