करारी हार, पर कोई साफ़ विजेता नहीं
क्या हुआ
ओडिशा में सरकार चला रही पार्टी निर्णायक रूप से हारी, हालाँकि उसकी जगह लेने के लिए किसी एक नई पार्टी को बहुमत नहीं मिला।
स्वतंत्र पार्टी 140 में से सिर्फ़ 49 सीटों के साथ सबसे आगे रही।
सत्ता से बाहर हुई इंडियन नेशनल कांग्रेस बुरी तरह लुढ़क गई और 31 सीटों पर सिमट गई; यह करारी हार थी।
क्या बदला
कोई भी पार्टी अपने दम पर बहुमत के आसपास भी नहीं पहुँची।
इसके बजाय कई दलों ने मिलकर (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) बनाया, यानी साथ मिलकर चुनाव लड़ने और बाद में सत्ता बाँटने का समझौता, और सरकार की कमान सँभाली।
स्वतंत्र पार्टी और उसके सहयोगी दलों के पास मिलाकर 140 में से 75 सीटें थीं, जो 71 सीटों के बहुमत के आँकड़े को पार करने के लिए काफ़ी थीं।
अहम आँकड़े
उस चुनाव के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
सबसे कड़ा मुक़ाबला मुरुडा, ओडिशा में हुआ, जहाँ फ़ैसला सिर्फ़ 219 वोटों से हुआ; यह साल का सबसे कम (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) था।
दूसरी ओर, इस चुनाव का सबसे बड़ा जीत का अंतर भवानीपटना, ओडिशा में रहा, जहाँ विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से 66.1% आगे रहा।
इस चुनाव का सबसे अच्छा (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) बासुदेवपुर, ओडिशा में दर्ज हुआ, 63.4%।
सबसे भीड़ वाला मुक़ाबला चौद्वार, ओडिशा में था, जहाँ एक सीट के लिए 9 उम्मीदवार मैदान में थे।
पृष्ठभूमि
इस चुनाव में कई नई पार्टियों के नाम भी पहली बार मतपत्र पर आए।
इस साल जनता कांग्रेस और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने राज्य में पहली बार सीटें जीतीं।
नई सरकार की अगुवाई करने वाली पार्टी ख़ुद हाल ही में बनी थी; वह रियासतों के दौर के उस विपक्ष के विलय से बनी थी, जो बरसों से यहाँ दूसरे स्थान पर रहता आया था।