बहुमत के बिना भी कांग्रेस सत्ता में बनी रही
क्या हुआ
कांग्रेस ने सत्ता बनाए रखी, पर इस बार उसके पास पहले जैसा स्पष्ट बहुमत नहीं था।
इंडियन नेशनल कांग्रेस ने कुल 146 सीटों में से 69 सीटें जीतीं।
यह 74 सीटों के बहुमत के आँकड़े से कम था, और (ऐसा परिणाम जिसमें किसी एक पार्टी को अकेले सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिलतीं) विधान सभा बनी।
क्या बदला
यहाँ कांग्रेस की यह लगातार दूसरी जीत थी, हालाँकि फिर से अपने दम पर बहुमत के बिना।
वह अब ओडिशा में लगातार 2 चुनाव जीत चुकी थी।
पिछले चुनाव के मुक़ाबले उसकी अपनी सीटें 18 बढ़ीं।
उसकी सबसे क़रीबी प्रतिद्वंद्वी उत्कल कांग्रेस 35 सीटों के साथ काफ़ी पीछे रही।
अहम आँकड़े
उस साल के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
सबसे क़रीबी मुक़ाबला: नीलगिरि, ओडिशा का फ़ैसला सिर्फ़ 49 वोटों से हुआ, जो उस साल किसी भी सीट पर सबसे कम (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) था।
दूसरी ओर, कामाख्यानगर, ओडिशा में जीत का अंतर 59.8% वोट रहा, जो पूरे राज्य के सबसे एकतरफ़ा परिणामों में से एक था।
साल का सबसे ज़्यादा (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) राजनगर, ओडिशा में रहा, 75.0%।
राज्य भर में मतदान प्रतिशत 48.8% पहुँचा, जो तब तक ओडिशा के किसी विधान सभा चुनाव में दर्ज सबसे ऊँचा था।
पृष्ठभूमि
उस साल मुक़ाबले में भीड़ थी: कई दलों और निर्दलीयों ने कम से कम एक-एक सीट जीती।
कुल मिलाकर 9 दलों ने सीटें जीतीं, और 7 निर्दलीय भी जीते।