एक पार्टी ने अपने दम पर साफ़ जीत हासिल की
क्या हुआ
एक पार्टी ने इतनी सीटें जीतीं कि वह किसी (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) सहयोगी के बिना पूरी तरह अपने दम पर सरकार चला सके।
बहुजन समाज पार्टी ने कुल 403 सीटों में से 206 सीटें जीतीं।
यह बहुमत के लिए ज़रूरी सीटों से 4 सीटें ज़्यादा था।
उसकी सबसे क़रीबी प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी ने 97 सीटें जीतीं।
क्या बदला
इस बार जीतने वाली पार्टी के पास पिछले चुनाव में कहीं कम सीटें थीं।
उसकी अपनी सीटें 98 से बढ़कर 206 हो गईं।
सबसे बड़ा बदलाव सपा से बसपा की ओर रहा: 71 निर्वाचन क्षेत्र इसी तरह बदले।
अहम आँकड़े
उस चुनाव के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
सबसे क़रीबी मुक़ाबला जलेसर, उत्तर प्रदेश में हुआ, जहाँ (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) सिर्फ़ 72 वोट रहा।
दूसरी ओर, कुण्डा, उत्तर प्रदेश में विजेता की बढ़त दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार पर 46.8% वोट तक पहुँची, जो इस चुनाव का सबसे बड़ा जीत का अंतर था।
सबसे ज़्यादा (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) मुज़फ़्फ़राबाद, उत्तर प्रदेश में रहा, 71.1%।
उस साल हर सीट पर औसतन 15.1 उम्मीदवार मैदान में थे।
पृष्ठभूमि
इससे उन चुनावों का सिलसिला टूटा जिनमें किसी एक पार्टी को अकेले सरकार चलाने लायक़ सीटें नहीं मिली थीं।