वाम मोर्चे की वापसी
क्या हुआ
केरलम में सरकार फिर बदली; दोनों मोर्चों के बीच बारी-बारी से सत्ता बदलने का सिलसिला जारी रहा।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) ने 140 सीटों में से 38 सीटें जीतीं।
इससे वह 71 सीटों के बहुमत के आँकड़े से पीछे रह गई, यानी सदन (ऐसा परिणाम जिसमें किसी एक पार्टी को अकेले सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिलतीं) रहा।
अपने (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) मोर्चे के साथ मिलकर इसके पास 47.1% सीटें थीं।
दूसरे स्थान पर रही इंडियन नेशनल कांग्रेस ने 33 सीटें जीतीं।
क्या बदला
इसे भी एकतरफ़ा जीत माना गया: पिछले चुनाव में सबसे आगे रहे निर्दलीय उम्मीदवारों का कुल समर्थन तेज़ी से गिरा।
उनमें से 13 सीटें सीधे कांग्रेस के पास चली गईं, जो इस चुनाव का सबसे बड़ा बदलाव था।
पूरे राज्य में 140 सीटों में से 71 सीटों पर पिछले चुनाव के मुक़ाबले जीतने वाली पार्टी बदल गई।
अहम आँकड़े
उस चुनाव के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
सबसे क़रीबी मुक़ाबला होसदुर्ग, केरलम में हुआ, जहाँ (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) सिर्फ़ 59 वोट रहा।
उस साल सबसे बड़ा जीत का अंतर तानूर, केरलम में रहा, जहाँ विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से 46.6% वोट आगे रहा।
अरूर, केरलम में लगभग 89.8% पंजीकृत मतदाताओं ने वोट डाला, जो उस साल किसी भी सीट पर सबसे ज़्यादा था।
इस चुनाव में सबसे ज़्यादा उम्मीदवार रान्नी, केरलम में उतरे, बैलट पर 21 उम्मीदवार थे।
पृष्ठभूमि
इससे केरलम के दो प्रतिद्वंद्वी मोर्चों के बीच बारी-बारी से सत्ता बदलने का सिलसिला जारी रहा।