बड़े मोर्चे की ज़ोरदार जीत
क्या हुआ
यहाँ एक बड़ा (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) सत्ता में लौटा, इस बार सीटों के ज़बरदस्त बहुमत के साथ।
अकेले कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) ने 133 में से 52 सीटें जीतीं।
अपने सहयोगी दलों के साथ उसके पास कुल 104 सीटें थीं — सरकार बनाने के लिए ज़रूरी आँकड़े से काफ़ी ज़्यादा।
अकेली पार्टी के तौर पर इसकी सबसे क़रीबी प्रतिद्वंद्वी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया सिर्फ़ 19 सीटें जीत सकी।
क्या बदला
इस चुनाव में नए दल पहली बार विधान सभा में पहुँचे, जिससे मुक़ाबले में उतरे दलों का दायरा बढ़ गया।
मुस्लिम लीग और केरल कांग्रेस, दोनों ने यहाँ पहली बार सीटें जीतीं।
अपने गठबंधन के साथ मिलकर इसने 78.2% सीटें जीतीं, यानी साधारण बहुमत से कहीं बड़ी जीत।
अहम आँकड़े
उस चुनाव के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
सबसे कड़ा मुक़ाबला कासरगोड, केरलम में हुआ, जिसका फ़ैसला सिर्फ़ 95 वोटों से हुआ।
मतगणना का सबसे बड़ा (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) मंकडा, केरलम में रहा, 66.3% वोट।
सबसे कम (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) मन्नारक्काड, केरलम में रहा, 48.4%।
किसी भी निर्वाचन क्षेत्र से ज़्यादा पंजीकृत मतदाता उडुंबनचोला, केरलम में थे, कुल 85,709।
पृष्ठभूमि
यह परिणाम यहाँ पहले बनी कम्युनिस्टों की अगुवाई वाली सरकार की याद दिलाता था, हालाँकि इस बार गठबंधन अलग था।