केरलम फिर वाम की ओर
क्या हुआ
दोनों मोर्चों ने फिर जगह बदली, और केरलम में बारी-बारी से सरकार बदलने का सिलसिला जारी रहा।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) ने 140 सीटों में से 40 सीटें जीतीं।
इससे वह 71 सीटों के बहुमत के आँकड़े से पीछे रह गई, यानी सदन (ऐसा परिणाम जिसमें किसी एक पार्टी को अकेले सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिलतीं) रहा।
इसकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी इंडियन नेशनल कांग्रेस ने 37 सीटें जीतीं।
क्या बदला
दोनों मोर्चों ने फिर जगह बदली, और इसके लिए सीटों का अच्छा-ख़ासा हिस्सा दूसरे पक्ष के हाथ गया।
कांग्रेस की 14 सीटें सीधे माकपा के पास गईं, जो इस चुनाव का सबसे बड़ा बदलाव था।
पूरे राज्य में 140 सीटों में से 52 सीटों पर पिछले चुनाव के मुक़ाबले जीतने वाली पार्टी बदल गई।
अहम आँकड़े
उस चुनाव के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
साल का सबसे कड़ा मुक़ाबला कुन्नतुनाड, केरलम में हुआ, जहाँ (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) सिर्फ़ 60 वोट था। सबसे ज़्यादा उम्मीदवार भी यहीं मैदान में थे, कुल 20।
उस साल सबसे बड़ा जीत का अंतर वर्कला, केरलम में रहा, जहाँ विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से 34.6% वोट आगे रहा।
चेर्तला, केरलम में लगभग 84.5% पंजीकृत मतदाताओं ने वोट डाला, जो उस साल किसी भी सीट पर सबसे ज़्यादा था।
पूरे राज्य में कांग्रेस के (कुल डाले गए वोटों का वह हिस्सा जो किसी एक पार्टी या उम्मीदवार को मिला) असल में माकपा से ज़्यादा रहा, 30.4% के मुक़ाबले 21.6%, भले ही उसे बहुत कम सीटें मिलीं।
पृष्ठभूमि
इससे केरलम के दो प्रतिद्वंद्वी मोर्चों के बीच बारी-बारी का सिलसिला जारी रहा।