पुरानी सत्ताधारी पार्टी टूटी, कांग्रेस लौटी
क्या हुआ
सत्ताधारी जनता दल के टूटने के बाद इंडियन नेशनल कांग्रेस कर्नाटक की सत्ता में लौटी।
उसने भारी जीत दर्ज की और राज्य की 224 सीटों में से 132 सीटें जीतीं।
इससे वह 113 सीटों के बहुमत के आँकड़े से 19 सीटें आगे रही।
उसने 40.8% वोट पाकर 58.9% सीटें जीतीं।
भारतीय जनता पार्टी 20.7% वोटों और 44 सीटों के साथ उसके बाद रही।
चुनाव प्रचार
कर्नाटक के विधान सभा चुनाव से पहले, 1999 के मध्य में सत्ताधारी जनता दल टूट गया। मुख्यमंत्री जे एच पटेल, पार्टी अध्यक्ष सी बैरे गौड़ा और रामकृष्ण हेगड़े ने अपने गुट को भारतीय जनता पार्टी के साथ जोड़ा, जबकि दूसरे गुट की अगुवाई एच डी देवेगौड़ा और उपमुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने की।1
4 अगस्त 1999 को चुनाव आयोग ने पार्टी का चुनाव चिह्न 'चक्र' फ़्रीज़ कर दिया और आने वाले आम चुनाव के लिए दो गुटों को अस्थायी मान्यता दी: शरद यादव के नेतृत्व वाले गुट को जनता दल (यूनायटेड) और देवेगौड़ा के नेतृत्व वाले गुट को जनता दल (सेक्युलर) के रूप में।2
इसके बाद कर्नाटक की 224 सीटों वाली विधान सभा का चुनाव दो चरणों में हुआ: 11 अगस्त को अधिसूचित 120 सीटों पर 5 सितंबर को मतदान हुआ, और 17 अगस्त को अधिसूचित बाक़ी 104 सीटों पर 11 सितंबर को; दोनों की मतगणना एक साथ 6 अक्टूबर 1999 को हुई।3
क्या बदला
जनता दल मतदान से कुछ महीने पहले दो प्रतिद्वंद्वी दलों में टूट गई।
दो नए दल, जदयू और जद (एस), पहली बार विधान सभा में पहुँचे — ये पुरानी अविभाजित पार्टी के ही दो हिस्से थे।
1 कार्यकाल के बाद उसका सरकार का दौर भारी गिरावट के साथ ख़त्म हुआ।
सबसे बड़ा झुकाव जनता दल से कांग्रेस की ओर रहा: पार्टी बदलने वाली 171 सीटों में से 70 इसी तरह गईं।
अहम आँकड़े
सबसे कड़ा मुक़ाबला: बागलकोट, कर्नाटक का फ़ैसला 138 वोटों से हुआ — उस साल राज्य में कहीं भी सबसे कम (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा)।
दूसरी ओर, गुरमिटकल, कर्नाटक में जीत का अंतर 66.3% वोट रहा।
पंजीकृत मतदाताओं के हिसाब से उत्तरहल्ली, कर्नाटक राज्य की सबसे बड़ी सीट थी, जहाँ मतदाता सूची में 9,93,571 नाम थे — और उसी सीट पर उस साल सबसे कम (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) रहा, 46.7%।
राज्य में सबसे ज़्यादा मतदान प्रतिशत पुत्तूर, कर्नाटक में रहा, 79.6%, जबकि सबसे ज़्यादा उम्मीदवार चल्लकेरे, कर्नाटक में थे, 14।
पृष्ठभूमि
1983 के कर्नाटक चुनाव में जनता पार्टी ने 224 में से 95 सीटें जीतीं, जो अपने दम पर बहुमत से कम थीं, और रामकृष्ण हेगड़े ने भाजपा और निर्दलीयों के बाहरी समर्थन से मुख्यमंत्री पद की शपथ ली — यह राज्य की पहली ग़ैर-कांग्रेसी सरकार थी।4
जनता पार्टी की वही धारा आगे चलकर जनता दल बनी, जो 1999 में फिर टूटी — उसी साल कांग्रेस सत्ता में लौटी।1
निर्दलीयों को एक समूह गिनें तो उस साल 6 दलों ने सीटें जीतीं; निर्दलीयों को 19 सीटें मिलीं।