तीसरा कार्यकाल, विवादित मतगणना के साये में
क्या हुआ
जम्मू एण्ड कश्मीर नेशनल काँफ्रेंस ने जम्मू और कश्मीर में तीसरा कार्यकाल जीता, हालाँकि मुश्किल से।
उसने राज्य की 76 सीटों में से 40 सीटें जीतीं।
इससे वह 39 सीटों के बहुमत के आँकड़े से 1 सीटें ऊपर रही।
उसकी सबसे क़रीबी प्रतिद्वंद्वी इंडियन नेशनल कांग्रेस ने 20.2% वोट पाकर 26 सीटें हासिल कीं।
ख़ुद जम्मू एण्ड कश्मीर नेशनल काँफ्रेंस को 33.0% वोट मिले, जो 52.6% सीटों में बदल गए।
चुनाव प्रचार
मुस्लिम यूनाइटेड फ़्रंट 2 सितंबर 1986 को बना, जिसने राज्य के सत्ताधारी (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) के ख़िलाफ़ जमात-ए-इस्लामी कश्मीर, जम्मू एंड कश्मीर इत्तिहादुल मुस्लिमीन और जम्मू एण्ड कश्मीर पीपुल्स कांफ्रेस को एक साथ लाया।1
राजीव-फ़ारूक़ समझौते के बाद फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने 7 नवंबर 1986 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और नेशनल कॉन्फ़्रेंस-कांग्रेस की नई सरकार के मुखिया बने।2
चुनाव के लिए नेशनल कॉन्फ़्रेंस और कांग्रेस ने राज्य की 76 सीटें आपस में बाँटीं: नेशनल कॉन्फ़्रेंस 45 पर और कांग्रेस 31 पर लड़ी, और सामने मुस्लिम यूनाइटेड फ़्रंट ने 43 उम्मीदवार उतारे। फ़्रंट के घोषणापत्र में शिमला समझौते के तहत कश्मीर के मसले सुलझाने पर ज़ोर था।34
76 में से ज़्यादातर सीटों पर 23 मार्च 1987 को मतदान हुआ; भद्रवाह, लेह और कारगिल में अलग से जून में वोट पड़े। फ़्रंट के उम्मीदवारों में श्रीनगर की अमीरा कदल सीट से सैयद मोहम्मद यूसुफ़ शाह भी थे — जो बाद में हिज़्बुल मुजाहिदीन के प्रमुख सैयद सलाहुद्दीन के नाम से जाने गए।56
नेशनल कॉन्फ़्रेंस-कांग्रेस गठबंधन ने 76 में से 66 सीटें जीतीं। घाटी में फ़्रंट को लगभग 31% वोट मिले, लेकिन वह 4 सीटें ही जीत पाया; मतगणना में गड़बड़ियाँ हुईं, जिन्हें बाद में विद्वानों ने आगे चले उग्रवाद की पृष्ठभूमि के तौर पर बताया।7
क्या बदला
जम्मू एण्ड कश्मीर नेशनल काँफ्रेंस ने लगातार तीसरा चुनाव जीता, हालाँकि इस बार उसकी स्थिति कमज़ोर हुई।
उसकी सीटें 46 से घटकर 40 रह गईं।
उसका (कुल डाले गए वोटों का वह हिस्सा जो किसी एक पार्टी या उम्मीदवार को मिला) 14.0 प्रतिशत अंक घटा।
सबसे बड़ा बदलाव जम्मू एण्ड कश्मीर नेशनल काँफ्रेंस से कांग्रेस की ओर रहा: जिन 25 सीटों पर पार्टी बदली, उनमें से 7 इसी तरह बदलीं।
पिछले चुनाव से (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) 2.4 प्रतिशत अंक बढ़ा — यह यहाँ अब तक का सबसे ऊँचा मतदान प्रतिशत था।
अहम आँकड़े
सबसे क़रीबी मुक़ाबला बिजबेहरा, जम्मू और कश्मीर में हुआ, जहाँ (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) 100 वोट रहा।
डोडा, जम्मू और कश्मीर में सबसे एकतरफ़ा मुक़ाबला हुआ, जहाँ जीत 88.1% वोटों के अंतर से हुई।
उस साल किसी भी सीट से ज़्यादा मतदान प्रतिशत नगीन, जम्मू और कश्मीर में दर्ज हुआ, 96.4%।
पंजीकृत मतदाताओं के हिसाब से जदीबल, जम्मू और कश्मीर सबसे बड़ा निर्वाचन क्षेत्र था, मतदाता सूची में 72,225 नाम थे।
सबसे भीड़ वाला मुक़ाबला जम्मू कैंट, जम्मू और कश्मीर में था, जहाँ 24 उम्मीदवार मैदान में थे।
विवादित मतगणना के बीच मुस्लिम यूनाइटेड फ़्रंट को कश्मीर घाटी में लगभग 31% वोट मिले, लेकिन वह 4 सीटें ही जीत पाया।7
पृष्ठभूमि
23 मार्च 1987 के मतदान के बाद मतगणना में गड़बड़ियाँ दर्ज हुईं, और विद्वान इस परिणाम को 1980 के दशक के आख़िर से कश्मीर में उभरे उग्रवाद की पृष्ठभूमि के तौर पर बड़े पैमाने पर बताते हैं। उस मतगणना में हारने वाला मुस्लिम यूनाइटेड फ़्रंट सिर्फ़ एक साल पहले बना था, जिसने जमात-ए-इस्लामी कश्मीर, जम्मू एंड कश्मीर इत्तिहादुल मुस्लिमीन और जम्मू एण्ड कश्मीर पीपुल्स कांफ्रेस को एक साथ लाया था।71