कांग्रेस पहली बार सत्ता से बाहर
क्या हुआ
जनता पार्टी ने इंडियन नेशनल कांग्रेस को हराकर पहली बार भारी जीत के साथ राजस्थान में सत्ता हासिल की, और आज़ादी के बाद से राज्य विधान सभा पर उसकी लगातार पकड़ ख़त्म कर दी।
उसने कुल 200 सीटों में से 152 सीटें जीतीं।
इससे वह बहुमत के आँकड़े से 51 सीटें आगे रही।
जनता पार्टी ने 50.4% वोट पाकर 76.0% सीटें जीतीं।
कांग्रेस 31.5% वोट के साथ 41 सीटों पर सिमट गई।
चुनाव प्रचार
23 जनवरी 1977 को कांग्रेस (ओ), भारतीय लोक दल, भारतीय जनसंघ और सोशलिस्ट पार्टी ने अपनी अलग पहचान ख़त्म करके जनता पार्टी में विलय कर लिया। उस जून राजस्थान का विधान सभा चुनाव उसने अलग-अलग विपक्षी दलों के बजाय इसी एक बैनर तले लड़ा।1
18 अप्रैल 1977 को केंद्रीय गृह मंत्री चरण सिंह ने राजस्थान समेत कांग्रेस शासित नौ राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर कहा कि वे अपने राज्यपालों को विधान सभा भंग करने और नया जनादेश लेने की सलाह दें। 22 अप्रैल को क़ानून मंत्री शांति भूषण ने आकाशवाणी पर कहा कि नौ विधान सभाओं को भंग करके नए चुनाव कराने का साफ़ आधार मौजूद है।2
विधान सभा भंग होने से रोकने के लिए राजस्थान और कांग्रेस शासित कई और राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट में केंद्र के ख़िलाफ़ मुक़दमा किया। कोर्ट ने 29 अप्रैल 1977 को ये मुक़दमे ख़ारिज कर दिए, जिससे उस जून के चुनाव का रास्ता साफ़ हो गया।3
क्या बदला
यह पूरी तरह नई सीमाओं वाली सीटों पर हुआ पहला चुनाव था।
कुछ ही समय पहले (सीटों की सीमाओं को सरकारी तौर पर नए सिरे से खींचना, जो भारत की जनसंख्या में बदलाव के साथ समय-समय पर होता है) के ज़रिए सीटों की सीमाएँ नए सिरे से तय की गई थीं।
विधान सभा में सीटों की संख्या 184 से बढ़कर 200 हो गई।
कांग्रेस की जीत का सिलसिला बुरी हार के साथ ख़त्म हुआ।
इससे पहले वह लगातार 5 चुनाव जीत चुकी थी।
जनता पार्टी पिछले चुनाव के समय मौजूद ही नहीं थी; वह 0 सीटों से इस बार 152 सीटों पर पहुँची।
अहम आँकड़े
सबसे क़रीबी मुक़ाबला आहोर, राजस्थान में हुआ, जहाँ (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) 18 वोट रहा।
उस साल सबसे बड़ा जीत का अंतर हवा महल, राजस्थान में रहा, जहाँ विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से 78.2% वोट आगे रहा।
बहरोड़, राजस्थान में सभी सीटों में सबसे ऊँचा (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) दर्ज हुआ: 98.6%।
पंजीकृत मतदाताओं के हिसाब से कोलायत, राजस्थान राज्य का सबसे बड़ा निर्वाचन क्षेत्र था, मतदाता सूची में 1,05,341 नाम थे।
आमेर, राजस्थान में किसी भी सीट से ज़्यादा उम्मीदवार उतरे, बैलट पर 23 नाम थे।
उस साल पूरे राज्य में 200 सीटों के लिए 1,150 उम्मीदवार मैदान में थे।
पृष्ठभूमि
राज्य में जनता पार्टी की जीत के कुछ ही दिन बाद, 22 जून 1977 को भैरों सिंह शेखावत ने राजस्थान के पहले ग़ैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।4
उनकी सरकार 1980 में बर्ख़ास्त कर दी गई।4
वे 1990 से 1992 तक और फिर 1993 से 1998 तक दोबारा मुख्यमंत्री रहे; तब तक वे जनता पार्टी के बजाय भारतीय जनता पार्टी की ओर से राज्य की अगुवाई कर रहे थे।4