लगातार चौथी जीत, फिर भी बहुमत से पीछे
क्या हुआ
इंडियन नेशनल कांग्रेस फिर जीती, लेकिन इतनी सीटें नहीं मिलीं कि अकेले सरकार चला सके।
कांग्रेस ने कुल 184 सीटों में से 89 सीटें जीतीं।
इससे वह बहुमत के लिए ज़रूरी 93 सीटों से पीछे रह गई, यानी (ऐसा परिणाम जिसमें किसी एक पार्टी को अकेले सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिलतीं) सदन।
उसकी सबसे क़रीबी प्रतिद्वंद्वी स्वतंत्र पार्टी ने 48 सीटें जीतीं।
क्या बदला
यह चुनाव देश भर में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ नए सिरे से तय होने के बाद हुआ, इस प्रक्रिया को (सीटों की सीमाओं को सरकारी तौर पर नए सिरे से खींचना, जो भारत की जनसंख्या में बदलाव के साथ समय-समय पर होता है) कहते हैं।
विधान सभा में सीटों की संख्या 176 से बढ़कर 184 हो गई।
फिर भी, कांग्रेस अब राज्य में लगातार 4 चुनाव जीत चुकी थी।
अहम आँकड़े
उस चुनाव के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
सबसे क़रीबी मुक़ाबला: गुढ़ा, राजस्थान का फ़ैसला सिर्फ़ 53 वोटों से हुआ, जो उस साल पूरे राज्य में सबसे कम (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) था।
दूसरी ओर, इस चुनाव का सबसे बड़ा जीत का अंतर लसाड़िया, राजस्थान में रहा, जहाँ विजेता और दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार के बीच 63.9% वोटों का फ़ासला था।
इस चुनाव में सबसे ज़्यादा (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) कुम्हेर, राजस्थान में रहा, जहाँ 79.4% पंजीकृत मतदाताओं ने वोट डाला।
सबसे ज़्यादा मतदाताओं वाला निर्वाचन क्षेत्र जायल, राजस्थान था, जिसकी मतदाता सूची में 89,325 पंजीकृत मतदाता थे।
पृष्ठभूमि
इससे वही पार्टी सत्ता में बनी रही, सरकार नहीं बदली।