ऐसा चुनाव जिससे राज्य के ज़्यादातर लोग दूर रहे
क्या हुआ
इंडियन नेशनल कांग्रेस पंजाब की सत्ता में लौटी, ऐसे चुनाव में जिससे ज़्यादातर मतदाता दूर रहे।
उसने कुल 117 सीटों में से 87 सीटें जीतीं।
इससे वह बहुमत के आँकड़े से 28 सीटें आगे रही।
(पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) गिरकर 22.8% रह गया, जो पिछले चुनाव से बहुत कम था।1
क्या बदला
सबसे साफ़ बदलाव पंजाब के दो सबसे बड़े दलों के बीच दिखा।
55 सीटें शिरोमणि अकाली दल से कांग्रेस के पास गईं, जो उस साल किन्हीं भी दो दलों के बीच सबसे ज़्यादा था।
मतदान प्रतिशत पिछले चुनाव के मुक़ाबले 41.7 प्रतिशत अंक गिरा, क्योंकि उग्रवाद और अकाली दल के ज़्यादातर गुटों के बहिष्कार की वजह से बहुत से मतदाता वोट डालने नहीं आए।1
अहम आँकड़े
सबसे क़रीबी मुक़ाबला मोगा, पंजाब में हुआ, जिसका फ़ैसला 7 वोटों से हुआ।
जोगा, पंजाब में इस चुनाव की सभी सीटों में सबसे कम मतदान प्रतिशत दर्ज हुआ: 1.0%।1
मतगणना का सबसे एकतरफ़ा परिणाम नौशहरा पन्नुआं, पंजाब में आया, जहाँ (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) 85.8% वोट रहा।
उस साल 2 सीटों पर उम्मीदवार निर्विरोध जीते, यानी वहाँ सिर्फ़ एक उम्मीदवार खड़ा था और फ़ैसले के लिए मतदान की ज़रूरत नहीं पड़ी।
पृष्ठभूमि
चुनाव आयोग ने 20 नवंबर 1992 को अकाली दल के दोनों मुख्य गुटों की राजनीतिक दल के रूप में मान्यता रद्द कर दी, क्योंकि चुनाव का बहिष्कार करने के बाद वे एक भी सीट नहीं जीत पाए थे।2