कांग्रेस की भारी जीत के साथ वापसी
क्या हुआ
इंडियन नेशनल कांग्रेस भारी जीत के साथ पंजाब की सत्ता में लौटी।
उसने 104 में से 66 सीटें जीतीं, जो अकेले सरकार बनाने के लिए ज़रूरी सीटों से ज़्यादा थीं।
शिरोमणि अकाली दल 24 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही।
उसके (कुल डाले गए वोटों का वह हिस्सा जो किसी एक पार्टी या उम्मीदवार को मिला) 42.8% रहा, जो दूसरे स्थान पर रही पार्टी के 27.6% से काफ़ी आगे था।
क्या बदला
यहाँ सबसे साफ़ कहानी पिछले चुनाव के मुक़ाबले जीतने वाली पार्टी की अपनी वापसी की थी।
उसकी सीटें 38 से 66 हो गईं।
24 सीटें सीधे शिअद से कांग्रेस के पास गईं, जो उस साल किसी भी दो दलों के बीच सबसे ज़्यादा थीं।
(पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) भी पिछले चुनाव के मुक़ाबले 3.2 प्रतिशत अंक गिरा।
अहम आँकड़े
उस मतगणना के कुछ आँकड़े अपने आप में जानने लायक हैं।
कादियां, पंजाब में मतगणना का सबसे करीबी मुक़ाबला हुआ, जहाँ (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) सिर्फ़ 77 वोट रहा।
गुरु हर सहाय, पंजाब का परिणाम मतगणना में सबसे एकतरफ़ा रहा, जहाँ जीत का अंतर 57.9% वोट था।
नाभा, पंजाब में किसी भी सीट से ज़्यादा मतदान प्रतिशत दर्ज हुआ, 83.2%।
उस साल 1 सीट पर निर्विरोध जीत हुई — यानी ऐसी सीट जहाँ सिर्फ़ एक उम्मीदवार खड़ा था, इसलिए फ़ैसले के लिए मतदान की ज़रूरत नहीं पड़ी।
पृष्ठभूमि
पंजाब का नक्शा तब भी काफ़ी नया था: पंजाब पुनर्गठन अधिनियम 1 नवंबर 1966 को लागू हुआ, जब राज्य के हिंदी-भाषी दक्षिण-पूर्वी हिस्से से नया राज्य हरियाणा बना, उसके पहाड़ी ज़िले हिमाचल प्रदेश को दे दिए गए, और चंडीगढ़ साझा राजधानी के रूप में केंद्र शासित प्रदेश बना।1