कांग्रेस ढही, बहुमत किसी को नहीं
क्या हुआ
इस बार कोई भी एक पार्टी अपने दम पर सरकार बनाने लायक़ सीटें नहीं जीत सकी।
इससे गुजरात में (ऐसा परिणाम जिसमें किसी एक पार्टी को अकेले सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिलतीं) विधान सभा बनी।
(दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) के नाम से लड़ रही जनता दल सबसे ज़्यादा सीटों के साथ थोड़ा आगे निकली, कुल 70।
उसकी सबसे क़रीबी प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी 67 सीटों के साथ ज़्यादा पीछे नहीं थी।
क्या बदला
पिछली सरकार की अगुवाई करने वाली पार्टी का समर्थन इस बार ढह गया, जिससे दो नए दलों के लिए मैदान खुल गया।
अकेले इंडियन नेशनल कांग्रेस से भाजपा के पास 57 सीटें गईं — उस साल किन्हीं भी दो दलों के बीच सबसे बड़ा बदलाव।
ख़ुद जनता दल उस नाम से पहली बार चुनाव लड़ रही थी।
अहम आँकड़े
चुनाव परिणामों के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
सबसे कड़ा मुक़ाबला लींबडी, गुजरात में हुआ, जहाँ (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) सिर्फ़ 170 वोट रहा।
दूसरे छोर पर, कुतियाणा, गुजरात साल का सबसे एकतरफ़ा मुक़ाबला रहा, जहाँ जीत का अंतर 74.9% वोट था।
सबसे ज़्यादा (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) वागरा, गुजरात में रहा, जहाँ यह 72.9% तक पहुँचा।
उस साल सबसे ज़्यादा मतदाता चोर्यासी, गुजरात में थे, मतदाता सूची में 4,20,045 लोग थे।
पृष्ठभूमि
पिछले दशक में उस पार्टी के उभार को ताक़त देने वाली गठबंधन की रणनीति का राज्य में विरोध भी हुआ था।