बहुमत घटा, सरकार वही
क्या हुआ
त्रिपुरा का सत्ताधारी वामपंथी (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) सत्ता में बना रहा, हालाँकि विधान सभा में उसका हिस्सा पहले से कम रहा।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) ने 60 सीटों में से 37 सीटें जीतीं।
फिर भी यह बहुमत के लिए ज़रूरी सीटों से 6 ज़्यादा था।
इंडियन नेशनल कांग्रेस 12 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही।
क्या बदला
जीत के बावजूद माकपा का अपना समर्थन पिछले चुनाव से काफ़ी घट गया।
उसकी सीटें पिछले चुनाव की 51 से घटकर इस बार 37 रह गईं।
पूरे राज्य में 9 सीटें माकपा से कांग्रेस के पास गईं, जो इस चुनाव का सबसे बड़ा बदलाव था।
अहम आँकड़े
उस चुनाव के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
सबसे कड़ा मुक़ाबला छामनु, त्रिपुरा में हुआ, जहाँ (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) सिर्फ़ 64 वोट रहा।
दूसरी ओर, रामचंद्रघाट, त्रिपुरा में सबसे एकतरफ़ा मुक़ाबला हुआ, जहाँ विजेता 73.8% वोटों से आगे रहा।
पूरे राज्य में (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) 81.7% तक पहुँचा, जो उस समय तक त्रिपुरा में सबसे ज़्यादा था।
सबसे भरा हुआ बैलट टाउन बड़दोवाली, त्रिपुरा में था, जहाँ 6 उम्मीदवार मैदान में थे।
पृष्ठभूमि
राज्य का वामपंथी गठबंधन पहले से कम बहुमत के बावजूद एक और कार्यकाल के लिए सत्ता में बना रहा।
अब वह लगातार 2 चुनाव जीत चुकी थी।