वाम मोर्चे का लंबा दौर ख़त्म
क्या हुआ
भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार त्रिपुरा की सत्ता जीती; इस भारी जीत ने लंबे समय से चल रही वाम मोर्चा सरकार का अंत कर दिया।
उसने 60 सीटों में से 36 सीटें जीतीं।
इससे वह बहुमत के आँकड़े से 5 सीटें आगे रही।
राज्य में सरकार चला चुकी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) 16 सीटों पर सिमट गई।
वोटों में दोनों पार्टियाँ क़रीब थीं — 43.6% के मुक़ाबले 42.2% — लेकिन सीटों में बहुत दूर।
चुनाव प्रचार
7 अगस्त 2017 को अगरतला के लंबे समय से विधायक रहे सुदीप रॉय बर्मन और तृणमूल कांग्रेस के पाँच अन्य विधायक भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए; इस शुरुआती दलबदल से राज्य में पार्टी का संगठन खड़ा करने में मदद मिली। बर्मन ने आगे चलकर भाजपा के टिकट पर अगरतला सीट जीती।1
चुनाव से पहले भाजपा के त्रिपुरा चुनाव प्रभारी सुनील देवधर ने सहयोगी आईपीएफटी के साथ तय एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम जारी किया: आईपीएफटी अलग ‘त्विप्रालैंड’ राज्य की अपनी माँग पर ज़ोर नहीं देगी, और दोनों पार्टियाँ इसके बजाय आदिवासियों की सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक और भाषाई चिंताओं पर काम करेंगी।2
चुनाव आयोग ने घोषणा की कि 60 सीटों वाली विधान सभा के लिए मतदान 18 फ़रवरी को होगा और परिणाम 3 मार्च को घोषित होंगे, नागालैंड और मेघालय के चुनावों के साथ।3
मतदान से पहले प्रचार के अपने आख़िरी भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि राज्य ‘हीरे का हक़दार है, लेकिन उसे पाने के लिए उसे माणिक छोड़ना होगा’ — यह मौजूदा मुख्यमंत्री माणिक सरकार के नाम पर किया गया शब्दों का खेल था।4
भारतीय जनता पार्टी और इंडीजेनस पीपुल्स फ्रंट के (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) ने आगे चलकर 60 में से 44 सीटें जीतीं, भाजपा ने 36 और आईपीएफटी ने 8, और इसके साथ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्ससिस्ट) के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार के लगातार 25 साल ख़त्म हुए। बिप्लब कुमार देब ने 9 मार्च को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।5
क्या बदला
भाजपा और आईपीएफटी — इनमें से हर पार्टी ने त्रिपुरा में पहली बार विधान सभा सीटें जीतीं।
लगातार जीत के लंबे सिलसिले के बाद माकपा बुरी तरह ढह गई।
इससे पहले वह लगातार 8 चुनाव जीत चुकी थी।
सबसे बड़ा बदलाव माकपा से भाजपा की ओर रहा: जिन 45 सीटों पर पार्टी बदली, उनमें से 26 इसी तरह बदलीं।
अपने सहयोगी के साथ मिलकर, एक गठबंधन के रूप में, भाजपा के पास 44 सीटें थीं।
अहम आँकड़े
सबसे क़रीबी मुक़ाबला मनु, त्रिपुरा में हुआ, जहाँ (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) 193 वोट रहा।
चारिलाम, त्रिपुरा में तस्वीर उलटी रही, जहाँ जीत 85.9% वोटों के अंतर से हुई।
सबसे ज़्यादा (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) खोवाई, त्रिपुरा में रहा, जहाँ 95.8% पंजीकृत मतदाताओं ने वोट डाला।
राज्य का सबसे कम मतदान प्रतिशत भी, चारिलाम, त्रिपुरा में, 80.9% था।
पंजीकृत मतदाताओं के हिसाब से बधारघाट, त्रिपुरा सबसे बड़ा निर्वाचन क्षेत्र था, जिसकी मतदाता सूची में 57,394 नाम थे।
उस साल सबसे ज़्यादा उम्मीदवार बनमालीपुर, त्रिपुरा में उतरे, कुल 8।
पृष्ठभूमि
त्रिपुरा 21 जनवरी 1972 को भारत का पूर्ण राज्य बना; इससे पहले वह 1956 से बिना विधायिका वाला केंद्र शासित प्रदेश था, और 1963 से वहाँ एक निर्वाचित मंत्रिमंडल था।6
इसे मणिपुर और मेघालय के साथ पूर्वोत्तर क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम, 1971 के तहत पूर्ण राज्य बनाया गया।6
पूर्ण राज्य के रूप में त्रिपुरा के ज़्यादातर इतिहास में माकपा ने सरकार चलाई थी, जब तक कि 2018 में भाजपा ने यह दौर ख़त्म नहीं कर दिया।