वाम दलों की पहली जीत
क्या हुआ
एक वामपंथी (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) पहली बार भारी जीत के साथ सत्ता में आया और राज्य पर कांग्रेस की पकड़ ख़त्म हो गई।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) ने 60 सीटों में से 51 सीटें जीतीं।
सत्ता से बाहर हो रही इंडियन नेशनल कांग्रेस बुरी तरह हारी और उसे गिनी-चुनी सीटें ही मिलीं।
उसकी सबसे क़रीबी प्रतिद्वंद्वी इस बार एक नई पार्टी, त्रिपुरा उपजाति जुबा समिति, थी, जिसने अपने दम पर 4 सीटें जीतीं।
क्या बदला
यह सरकार का असली बदलाव था, सिर्फ़ जाने-पहचाने प्रतिद्वंद्वियों के बीच की अदला-बदली नहीं।
माकपा पिछले चुनाव की 16 सीटों से बढ़कर इस बार 51 सीटों पर पहुँची।
नए दलों, त्रिपुरा उपजाति जुबा समिति और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी, ने भी पहली बार विधान सभा में सीटें जीतीं।
वह बहुमत के आँकड़े से 20 सीटें आगे रही।
अहम आँकड़े
उस चुनाव के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
पूरे राज्य में (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) 78.0% तक पहुँचा, जो उस समय तक त्रिपुरा में सबसे ज़्यादा था।
सबसे कड़ा मुक़ाबला बेलोनिया, त्रिपुरा में हुआ, जहाँ (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) सिर्फ़ 119 वोट रहा।
दूसरी ओर, रामचंद्रघाट, त्रिपुरा में सबसे एकतरफ़ा मुक़ाबला हुआ, जहाँ विजेता 71.7% वोटों से आगे रहा।
सबसे भरा हुआ बैलट पानीसागर, त्रिपुरा में था, जहाँ 11 उम्मीदवार मैदान में थे।
पृष्ठभूमि
त्रिपुरा के चुनावी रिकॉर्ड में तब तक यह पहला मौक़ा था जब सत्ता बदली।