किसी को बहुमत नहीं, सरकार बदली
क्या हुआ
किसी पार्टी को अकेले सरकार बनाने लायक़ सीटें नहीं मिलीं, और सबसे आगे रही पार्टी आख़िर में सरकार का नेतृत्व नहीं कर पाई।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) 60 में से 26 सीटें जीतकर सबसे आगे रही।
यह बहुमत के लिए ज़रूरी 31 सीटों के आँकड़े से कम था।
उसकी सबसे क़रीबी प्रतिद्वंद्वी इंडियन नेशनल कांग्रेस ने 25 सीटें जीतीं।
क्या बदला
पिछले चुनाव के मुक़ाबले विधान सभा की बड़ी संख्या में सीटें दूसरे हाथों में चली गईं।
पूरे राज्य में 13 सीटें माकपा से कांग्रेस के पास गईं, जो इस चुनाव का सबसे बड़ा बदलाव था।
माकपा की अपनी सीटें पिछले चुनाव की 37 से घटकर इस बार 26 रह गईं।
अहम आँकड़े
उस चुनाव के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
मतगणना का सबसे कड़ा मुक़ाबला माताबाड़ी, त्रिपुरा में हुआ, जहाँ (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) सिर्फ़ 8 वोट रहा।
पूरे राज्य में (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) 84.6% तक पहुँचा, जो उस समय तक त्रिपुरा में सबसे ज़्यादा था।
दूसरी ओर, आशारामबाड़ी, त्रिपुरा में सबसे एकतरफ़ा मुक़ाबला हुआ, जहाँ विजेता 57.5% वोटों से आगे रहा।
सबसे भरा हुआ बैलट फटिकराय, त्रिपुरा में था, जहाँ 7 उम्मीदवार मैदान में थे।
पृष्ठभूमि
इसके बजाय एक प्रतिद्वंद्वी (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) ने सरकार बनाई; इससे पहले के चुनाव प्रचार में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी।