फिर सरकार, पर सीटें कम
क्या हुआ
त्रिपुरा की वाम दलों के नेतृत्व वाली सत्ताधारी पार्टी एक और कार्यकाल के लिए सत्ता में बनी रही।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) ने कुल 60 सीटों में से 38 सीटें जीतीं।
वह इंडियन नेशनल कांग्रेस से काफ़ी आगे रही, जिसने 13 सीटें जीतीं।
माकपा को 45.5% वोट मिले।
क्या बदला
सत्ता में बने रहने के बावजूद सीटों के स्तर पर माकपा का अपना समर्थन घटा।
इस बार उसने 38 सीटें जीतीं, जबकि पिछले चुनाव में 44 जीती थीं।
उसकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी ने भी बढ़त बनाई: इस बार 7 सीटें माकपा से कांग्रेस के पास चली गईं।
अहम आँकड़े
उस चुनाव के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
सबसे कड़ा मुक़ाबला टाकारजला, त्रिपुरा में रहा, जहाँ फ़ैसला सिर्फ़ 6 वोटों से हुआ।
सबसे बड़ा (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) आशारामबाड़ी, त्रिपुरा में रहा, 54.5% वोट।
उस साल किसी भी सीट पर सबसे ज़्यादा (पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) बक्सनगर, त्रिपुरा में दर्ज हुआ, 87.6%।
सबसे भीड़ वाला मुक़ाबला मोहनपुर, त्रिपुरा में था, जहाँ बैलट पर 9 उम्मीदवार थे।
पृष्ठभूमि
यह बरसों से सत्ता में रहे त्रिपुरा के सत्ताधारी वामपंथी (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) की एक और जीत थी।
इस चुनाव समेत वह अब लगातार 5 चुनावों में सबसे आगे रहा है।