कांग्रेस की ज़ोरदार वापसी
क्या हुआ
इस चुनाव में मतदाता साफ़ तौर पर एक पार्टी के पीछे खड़े हुए, और पिछली विधान सभा का गतिरोध ख़त्म हुआ।
इंडियन नेशनल कांग्रेस ने कुल 30 सीटों में से 21 सीटें जीतीं, हर लिहाज़ से यह एकतरफ़ा जीत थी।
इससे उसके पास बहुमत के लिए ज़रूरी 16 सीटों के आँकड़े से 5 सीटें ज़्यादा हो गईं।
दूसरा सबसे बड़ा गुट निर्दलीय उम्मीदवारों का था, जिन्होंने मिलकर 4 सीटें जीतीं।
क्या बदला
पिछले चुनाव की बराबरी पर बँटी विधान सभा की जगह इस बार एक अकेला, दबदबे वाला विजेता आया।
पिछले चुनाव में सबसे आगे रही इंडियन नेशनल कांग्रेस (इंदिरा) बुरी तरह ढह गई।
ख़ुद कांग्रेस उस नाम से पहली बार चुनाव लड़ रही थी।
एक ही चुनाव में उसकी सीटें 0 से 21 हो गईं।
अहम आँकड़े
चुनाव परिणामों के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
सबसे कड़ा मुक़ाबला दापोरिजो, अरुणाचल प्रदेश में हुआ, जहाँ (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) सिर्फ़ 22 वोट रहा।
दूसरी ओर, यिंगकियोंग-पांगिन, अरुणाचल प्रदेश में मतगणना का सबसे बड़ा जीत का अंतर रहा, जहाँ विजेता 32.4% वोटों से आगे रहा।
(पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) 70.4% तक पहुँचा, जो उस समय तक इस प्रदेश के अपने इतिहास में सबसे ऊँचा था।
सबसे भरा हुआ बैलट नियाउसा कनुबारी, अरुणाचल प्रदेश में था, जहाँ इस सीट के लिए 10 उम्मीदवार मैदान में थे।
पृष्ठभूमि
यह चुनाव उसी अस्थायी व्यवस्था पर लड़ा गया जिस पर विधान सभा अपने गठन के समय से चल रही थी।
अरुणाचल प्रदेश पर तब भी उसी व्यवस्था के तहत शासन चल रहा था।