चुनाव की कहानी
क्या हुआ
लंबे समय से मैसूर पर राज करने वाली पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के दो प्रतिद्वंद्वी गुटों में बँट चुकी थी, फिर भी यहाँ उसकी इकाई निर्णायक रूप से जीती।
इंडियन नेशनल कांग्रेस ने 216 में से 165 सीटें जीतीं; किसी भी नज़र से यह भारी जीत थी।
उसकी सबसे क़रीबी प्रतिद्वंद्वी इंडियन नेशनल कांग्रेस (संगठन) थी, जिसने 24 सीटें जीतीं।
क्या बदला
यह जीत यहाँ पार्टी की पिछली जीतों से अलग झंडे तले आई।
जीतने वाला गुट (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) के नाम से लड़ा, जो पहले के वर्षों की अविभाजित पार्टी से अलग था।
पार्टी अब मैसूर में राज्य के पहले चुनाव से लेकर लगातार 5 चुनाव जीत चुकी थी।
अहम आँकड़े
उस चुनाव के कुछ आँकड़े अलग से ध्यान खींचते हैं।
सबसे क़रीबी मुक़ाबला: मंड्या, मैसूर में (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) सिर्फ़ 147 रहा।
दूसरी ओर, मूडिगेरे, मैसूर में विजेता ने दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार को 73.8% वोटों के अंतर से हराया।
सबसे ज़्यादा मतदाता मल्लेश्वरम, मैसूर में थे, जहाँ 1,20,653 लोग वोट देने के लिए पंजीकृत थे।
सबसे भीड़ वाला मुक़ाबला चिकपेट, मैसूर में था, जहाँ एक ही सीट के लिए 13 उम्मीदवार मैदान में थे।
पृष्ठभूमि
इस चुनाव की दोनों प्रमुख पार्टियाँ उसी कांग्रेस संगठन से निकली थीं, जो राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिद्वंद्वी गुटों में बँट गया था।