झारखंड का पहला चुनाव त्रिशंकु विधान सभा पर ख़त्म
क्या हुआ
झारखंड के पहले विधान सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने सबसे ज़्यादा सीटें जीतीं, लेकिन बहुमत लायक़ नहीं — यानी (ऐसा परिणाम जिसमें किसी एक पार्टी को अकेले सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिलतीं) विधान सभा बनी।
उसने 81 में से 30 सीटें जीतीं, जो बहुमत के लिए ज़रूरी 41 से कम थीं।
झारखण्ड मुक्ति मोर्चा 17 सीटों के साथ उसके बाद रही, और 12 दलों ने कम से कम एक-एक सीट जीती।
(पंजीकृत मतदाताओं में से कितने प्रतिशत ने असल में वोट डाला) 57.0% रहा।
क्या बदला
इसके बाद बनी सरकार अस्थिर रही: मार्च 2005 से जनवरी 2009 के बीच मुख्यमंत्री चार बार बदले, फिर एक साल राष्ट्रपति शासन रहा।1
वह सरकार एक बड़े (दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है, और सब मिलाकर काफ़ी सीटें जीतने पर सत्ता में साझेदारी करता है) पर टिकी थी — यानी दलों का ऐसा समूह जो मिलकर चुनाव लड़ता है और मिलकर पर्याप्त सीटें जीतने पर बाद में सत्ता बाँटता है।
भाजपा के अपने गठबंधन के पास कुल 36 सीटें थीं, यानी सदन का 44.4% — फिर भी अपने दम पर बहुमत से कम।
अहम आँकड़े
सबसे क़रीबी मुक़ाबला हुसैनाबाद, झारखंड में हुआ, जिसका फ़ैसला 35 वोटों से हुआ।
सबसे एकतरफ़ा परिणाम खरसांवा, झारखंड में आया, जहाँ (विजेता दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार से कितने वोटों से आगे रहा) 50.6% वोट रहा।
किसी भी सीट पर सबसे कम मतदान प्रतिशत लातेहार, झारखंड में दर्ज हुआ, 39.1%।
सबसे ज़्यादा उम्मीदवार बोकारो, झारखंड में थे: एक ही सीट पर 53 उम्मीदवार।
पृष्ठभूमि
झारखंड ख़ुद मुश्किल से पाँच साल पुराना था: बिहार पुनर्गठन अधिनियम के तहत 15 नवंबर 2000 को दक्षिणी बिहार को अलग करके यह राज्य बना था, और यह इसका पहला पूर्ण विधान सभा चुनाव था।2